हिंदी आलोचना और समकालीन कविता के प्रखर हस्ताक्षर प्रो. परमानन्द श्रीवास्तव के अवदान को स्मरण करना वस्तुतः हिंदी के रचनात्मक और वैचारिक विवेक का पुनर्नवा होना है। प्रेमचंद साहित्य संस्थान द्वारा 19–20 सितंबर को ‘परमानन्द श्रीवास्तव : अवदान और महत्व’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन तथा इस अवसर पर स्मारिका का प्रकाशन, हमारे समय का एक अत्यंत आवश्यक और सार्थक सांस्कृतिक दायित्व है।
परमानन्द जी का आलोचना-कर्म किसी बँधे-बँधाए ढाँचे का मोहताज नहीं था। वे कविता के भीतरी मर्म, बिंब-विधान और उसकी लोक-संवेदना को पहचानने वाले अत्यंत संवेदनशील सहृदय आलोचक थे। उनका चिंतन रचना और समाज के द्वंद्वात्मक रिश्ते को जितनी गहराई से उद्घाटित करता है, वह नई पीढ़ी के अध्येताओं के लिए एक अनिवार्य पाठ है। गोरखपुर की जिस उर्वर साहित्यिक परंपरा को उन्होंने अपनी प्रखर बौद्धिक दृष्टि और आत्मीयता से सींचा, वह हम सभी के लिए अमूल्य धरोहर है।
कवि-आलोचक केदारनाथ सिंह जी ने भी संस्थान को यह आत्मीय सलाह दी थी कि परमानन्द जी के कृतित्व पर एक गंभीर आयोजन होना चाहिए। आज यह संगोष्ठी उसी प्रेरणा और संकल्प का साकार रूप है। प्रेमचंद साहित्य संस्थान सदैव ऐसी साहित्यिक चेतना के विस्तार के लिए प्रतिबद्ध रहा है।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि दो दिवसीय विचार-मंथन से निःसृत निष्कर्ष और यह स्मारिका समकालीन आलोचना के परिदृश्य में परमानन्द जी के योगदान के नए आयामों को रेखांकित करेगी।
संगोष्ठी में पधारे सभी विद्वानों, शोधार्थियों और सुधी श्रोताओं का हार्दिक अभिनंदन। आयोजन की पूर्ण सफलता के लिए मेरी अनंत शुभकामनाएँ।
परमानंद श्रीवास्तव 1982–84 में हमारे शिक्षक थे। गोरखपुर विश्वविद्यालय और बौद्धिक समाज में वे अपनी विशिष्ट भाषिक बनावट और असाधारण वक्तृता के लिए पहचाने जाते थे। ‘नवता’ के प्रति उनके मन में गहरा आकर्षण था, इसलिए उन्होंने नए को पहचानने और प्रोत्साहित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपने समकालीन आलोचकों के बीच वे नए से नए रचनाकार को सबसे पहले रेखांकित करने और आगे बढ़ाने के मामले में सर्वथा अप्रतिम थे।
वे जब साहित्य में आए, तो शेष दुनिया के प्रायः सभी सांसारिक सरोकारों से स्वयं को मुक्त करके आए थे। कविता और साहित्य के अतिरिक्त उनकी कोई दूसरी ‘कॉन्स्टिट्यूअंसी’ नहीं थी। यह उनकी सामर्थ्य भी थी और सीमा भी; इसी के भीतर उन्होंने साहित्य की अनेक पीढ़ियों को गढ़ा। नयापन स्वीकारने का उनका यह आग्रह मूलतः यथास्थिति के विरुद्ध था। यथास्थिति से जूझता हुआ व्यक्ति प्रायः अकेला पड़ जाता है—परमानंद जी भी इसके अपवाद नहीं थे। साहित्य और संस्कृति के संश्लिष्ट प्रश्न और उसकी जटिल ग्रंथियाँ इसी तरह के निपट एकांत में सुलझाई जाती हैं। ‘साधु न चले जमात’ का विश्वासी ही अपने समय की जड़ताओं से टकराता है और दुनिया को कुछ बेहतर बनाने की दिशा में कुछ सार्थक कर गुजरता है। परमानंद जी ने अपनी युवा पीढ़ी की संवेदनात्मक भाषा को जो गति दी, वह प्रत्यक्ष भले न दिखे, पर उसे ठहरकर गहराई से समझने की आवश्यकता है।
अस्सी के दशक में गोरखपुर के साहित्यिक परिवेश में उनकी बहुचर्चित कविता ‘अगली शताब्दी के बारे में’ गूँज रही थी। आज जब उनकी दृष्टि में उभरने वाली वह ‘अगली शताब्दी’ अपना एक-चौथाई सफर पूरा कर चुकी है, तब विचार करने की ज़रूरत है कि ‘मानवीय पतझर’ के इस दौर में भाषा के कौन-से विकल्प शेष रह गए हैं और ‘हिंसा नक्षत्रों से किस तरह पेश आ रही है’।
गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी-विभाग में ‘प्रेमचंद पीठ’ की स्थापना—प्रतीकात्मक रूप से ही सही—आगे की यात्रा का एक बड़ा प्रस्थान-बिंदु थी, जिसके कारक स्वयं परमानंद जी थे। प्रेमचंद पीठ से अवकाश ग्रहण करने के बाद वे ‘प्रेमचंद साहित्य संस्थान’ के अध्यक्ष बने और गोरख, कबीर तथा प्रेमचंद की विचार-परंपरा को आगे बढ़ाने में निरंतर हमारा मार्गदर्शन करते रहे।
परमानंद जी के निधन के उपरांत, आधी सदी से भी अधिक समय तक उनके अनन्य मित्र रहे कवि-आलोचक केदारनाथ सिंह संस्थान के अध्यक्ष बने। दायित्व सँभालने के बाद केदार जी का पहला कार्य था—परमानंद जी की स्मृति में ‘कविता का भविष्य’ शीर्षक व्याख्यान देना। व्याख्यान के आरंभ में ही उन्होंने स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया कि प्रेमचंद साहित्य संस्थान की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वह परमानंद श्रीवास्तव के समग्र अवदान पर एक विधिवत आयोजन करे। केदार जी के लिए गोरखपुर में कविता को याद करने का अर्थ परमानंद जी को याद करना था; वे अक्सर कहते थे कि उन्होंने परमानंद जी जैसा अटूट काव्य-प्रेमी नहीं देखा। केदार जी की इच्छा थी कि उनकी उपस्थिति में ही यह आयोजन संपन्न हो, किंतु परिस्थितियोंवश ऐसा संभव न हो सका।
प्रस्तुत संगोष्ठी मूलतः केदार जी के उसी सुझाव और संकल्प की परिणति है।
इस आयोजन की संकल्पना को साकार करने में परमानंद जी को चाहने वाले अनेक साहित्यानुरागी, उनके लेखन और उनकी साहित्यिक प्रतिबद्धताओं से गहरा सरोकार रखने वाले सुधी जन तन, मन और धन से सहभागी बने हैं। इसमें परमानंद जी का परिवार उत्साहपूर्वक शामिल है।
रज़ा फाउंडेशन ने सबसे पहले सहयोग हमारे लिए आरम्भिक प्रेरणा बना। परमानंद श्रीवास्तव स्मृति न्यास और हिन्दुस्तानी अकादमी ने संबल प्रदान किया। इस आयोजन से जुड़े सभी आत्मीय जनों के प्रति अंतःकरण से कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।
मैंने सदानंद शाही से कहा था कि परमानंद जी पर एक विधिवत आयोजन होना चाहिए, और वह आयोजन प्रेमचंद साहित्य संस्थान की ओर से होना चाहिए। मैं जानता हूँ कि इस नगर में पहले भी कई गोष्ठियाँ हुई हैं; लेकिन चूँकि वे प्रेमचंद साहित्य संस्थान के अध्यक्ष भी रहे थे, इस नाते इस संस्थान का यह नैतिक दायित्व बनता है कि वह परमानंद जी के अवदान को गंभीरता से याद करे। याद करने का अर्थ है — उनके कृतित्व और आलोचना-दृष्टि का मूल्यांकन करना। उनका साहित्यिक अवदान ऐसा नहीं है जिसे सरलता से खारिज किया जा सके। उन्होंने बहुत बड़ा काम किया है, और आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तो उनका वह काम और भी विराट रूप में दिखाई देता है।
गोरखपुर में बैठकर कविता को याद करना, मेरे लिए परमानंद श्रीवास्तव को याद करना है। इतना अटूट, अखंड और दूरगामी काव्य-प्रेमी मुझे दूसरा कोई नजर नहीं आता। मैं केवल गोरखपुर की बात नहीं कर रहा, समूचे हिंदी प्रदेश में उनके जैसा समर्पित काव्य-अनुरागी विरला ही है।
मुझे याद आता है, मैं पहली बार परमानंद जी से इलाहाबाद में मिला था। वह 1957 या 1958 का समय रहा होगा — आज इतनी लंबी अवधि बीत जाने के बाद स्मृतियाँ कुछ धुँधली पड़ जाती हैं। वह नई कविता का दौर था और उसे लेकर अनेक तरह की बहसें चल रही थीं। उस संगोष्ठी में मुक्तिबोध भी उपस्थित थे। मुक्तिबोध की उपस्थिति में परमानंद जी से मिलना आज अकल्पनीय सा लगता है। एक साधारण व्यक्ति की तरह मुक्तिबोध वहाँ बैठे हुए थे। परमानंद जी को नई कविता पर अपना एक आलेख पढ़ना था। उन्होंने जो पर्चा पढ़ा, मुझे उसका शीर्षक तो ठीक-ठीक याद नहीं, किंतु आलेख बहुत प्रभावी था।
अंत में मुक्तिबोध को अपनी बात कहनी थी। उन्होंने बोलते हुए परमानंद जी के वक्तव्य पर एक बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी कि ‘साहित्य कोई कंडिशन्ड रिफ्लेक्स (conditioned reflex) नहीं है।’ मुक्तिबोध ने परमानंद जी की भाषा और उनकी दृष्टि की बहुत सकारात्मक सराहना की थी। मुक्तिबोध शारीरिक गठन में परमानंद जी से कुछ नाटे और दुबले-पतले थे। वह बहुत सुखद और अविस्मरणीय दृश्य था। परमानंद जी से वह मेरी पहली भेंट थी।
मैं जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) का प्राध्यापक रहा हूँ और आज भी स्वयं को जेएनयू परिवार का ही मानता हूँ। आज जेएनयू को लेकर जो भी लांछन लगाए जाएँ — चाहे कोई ‘देशद्रोही’ कहे या कुछ और — मैं सब सुनने को तैयार हूँ; किंतु मुझे 1984 का वह भयावह दौर आज भी याद है। इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद जब दिल्ली में सिखों के विरुद्ध हिंसा और कत्लेआम शुरू हुआ, उन दिनों परमानंद जी दिल्ली में मेरे जेएनयू स्थित आवास पर ही ठहरे हुए थे।
उस भयानक हत्याकांड के समय जेएनयू के कुछ छात्र मेरे घर आए। परमानंद जी और मैं साथ ही खड़े थे। वे छात्र हम दोनों को साथ लेकर विश्वविद्यालय के आसपास की बस्तियों और गलियों में निकल पड़े। हम कई दिनों तक उन इलाकों में पहरा देते रहे, ताकि किसी बेकसूर सिख नागरिक का कोई अहित न हो, किसी को मारा न जाए। हमारे छात्रों की इस सजगता का ही परिणाम था कि जेएनयू और उसके आसपास के पूरे क्षेत्र में हिंसा की एक भी अप्रिय घटना नहीं घटी। यह मानवीय सरोकार जेएनयू के उन छात्रों का था, जिन्हें आज कुछ लोग बड़बोला या लांछित कहते हैं। उनके भीतर समाज के प्रति जो गहरी करुणा और समर्पण था, उसे समझना चाहिए।
उस समय परमानंद जी भी बेहद घबराए हुए हमारे साथ चल रहे थे — छात्र आगे-आगे और हम पीछे-पीछे। मैंने परमानंद जी का एक संवेदनशील नागरिक रूप उस दिन देखा था। वे भीतर तक काँप गए थे और बार-बार बेचैन होकर पूछते थे — “यह हमारे देश में क्या हो रहा है? हमारा समाज किधर जा रहा है?” उस सांप्रदायिक विभीषिका ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया था।
परमानंद जी मेरे अभिन्न मित्र थे; आजीवन हमारी मित्रता अक्षुण्ण रही। व्यावहारिक जीवन में भी मैं उनका ऋणी रहा हूँ। मेरी पहली नियमित अध्यापकीय नियुक्ति में परमानंद जी की बड़ी भूमिका थी। सेंट एंड्रयूज कॉलेज, गोरखपुर में जब मैं कुछ समय के लिए प्राध्यापक बना, तब परमानंद जी वहाँ विभागाध्यक्ष (Head) थे। मैं उनका कनिष्ठ सहयोगी था, किंतु उन्होंने कभी विभागाध्यक्ष का दंभ नहीं दिखाया। वे अत्यंत सहृदय, गंभीर और विलक्षण शिक्षक थे।
परमानंद जी के अध्यापन और उनकी वक्तृता-शैली की पहली प्रशंसा मैंने इलाहाबाद में उनसे मिलने से पूर्व ही प्रो. नामवर सिंह के मुँह से सुनी थी। नामवर जी गोरखपुर के महाराणा प्रताप कॉलेज में किसी व्याख्यान के सिलसिले में आए थे। उस समय परमानंद जी सेंट एंड्रयूज कॉलेज में नए-नए प्रवक्ता नियुक्त हुए थे और तब शायद गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना भी नहीं हुई थी। गोरखपुर से लौटकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में जब हम शाम को टहलते हुए डॉ. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी के आवास की ओर जा रहे थे, तब रास्ते में नामवर जी ने कहा था कि गोरखपुर में एक अत्यंत विलक्षण प्रतिभा से भेंट हुई। नामवर जी ने विस्तार से बताया कि मंच पर उन्होंने उस युवक को बहुत निकट से सुना; उसके पास बहुत जानदार भाषा और मौलिक विचार हैं। नामवर जी यूँ ही किसी की प्रशंसा नहीं करते थे। नामवर जी की उस टिप्पणी ने ही मेरे भीतर परमानंद जी के प्रति गहरा कौतूहल जगाया था कि इस समकालीन से शीघ्र मिलना चाहिए।
बाद के वर्षों में किस कठिनाई और संघर्ष के बीच वे विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने, उसका भी मैं साक्षी रहा हूँ। मैं उस चयन समिति का सदस्य (विशेषज्ञ) था जिसने उनका चयन किया। उस समय की अकादमिक राजनीति और पैंतरेबाज़ियों के बीच उनका चयन आसान नहीं था; वे एक संघर्षपूर्ण जीवन जीकर आगे बढ़े थे।
परमानंद जी सभा-सोसायटियों के शोर से दूर, चुपचाप एक कोने में बैठकर केवल ‘साहित्य करने’ वाले व्यक्ति थे। मैं इसे ‘साहित्य करना’ कहता हूँ; उनके लिए साहित्य रचना और आलोचना किसी अनवरत श्रम-साधना की तरह था। वे सही अर्थों में साहित्य के कर्मठ मजदूर थे। शब्दों का संवेदनशील व्यवहार कैसे किया जाए और भाषा को कितनी अर्थ-छवियों में खोला जाए — इसकी अनेक मौलिक युक्तियाँ उनके पास थीं।
यद्यपि उनकी पहचान मुख्य रूप से एक समर्थ आलोचक के रूप में बनी, किंतु उन्होंने कहानियाँ और कविताएँ भी लिखीं। उनकी कविताएँ अत्यंत विचारोत्तेजक हैं। उनकी एक कविता ‘स्त्री सुबोधिनी’ मुझे विशेष रूप से प्रिय है। एक सजग प्राध्यापक जो पढ़ता-पढ़ाता है, उसके भीतर से कविता कैसे फूटती है — यह रचना उसका सुंदर प्रमाण है। भारतेंदु-युगीन पत्रिकाओं का अध्ययन करते हुए उन्होंने स्त्रियों के आचार-विचार को नियंत्रित करने वाले उपदेशात्मक लेख और पत्रिका देखी — ‘स्त्री सुबोधिनी’। उन्होंने मुझे फोन पर बड़े विस्मय से कहा था कि स्त्री को यह सिखाना कि वह क्या करे और क्या न करे, पितृसत्तात्मक सोच का कैसा रूप है! इसी अंतर्दृष्टि के आधार पर उन्होंने ‘स्त्री सुबोधिनी’ शीर्षक से अपनी वह प्रसिद्ध कविता रची, जो आज के स्त्री-विमर्श के दौर में भी एक अनिवार्य और उल्लेखनीय कविता है।
नई कविता जब आती है, तो अपने साथ नए प्रतिमान और नया आलोचक भी लेकर आती है। मुक्तिबोध को आरंभ में कोई स्वीकार नहीं करता था। मुझे भली-भाँति याद है, जब हम एम.ए. के छात्र थे, तब नामवर सिंह मुक्तिबोध से मिलकर उनकी कविता ‘ब्रह्मराक्षस’ को एक कागज़ पर उतारकर लाए थे और कक्षा में हमें पढ़कर सुनाई थी। बाद में नामवर जी ने ‘युगचेतना’/‘कल्पना’ में उस पर अपनी छोटी किंतु ऐतिहासिक टिप्पणी लिखी। किसी रचनाकार के नएपन और उसकी विशिष्टता पर सबसे पहले उँगली रखना ही आलोचक की सार्थकता है।
परमानंद श्रीवास्तव के भीतर नए को पहचानने की यह क्षमता अद्भुत थी। वे प्रतिभा को बहुत दूर से ‘सूँघ’ लेते थे। दूर किसी झाड़ी में खिला अदना सा फूल भी उनकी तीक्ष्ण दृष्टि और संवेदी नासिका से बच नहीं पाता था। वे नए रचनाकार की संवेदना को पहचानते थे और उसके लिए एक सर्वथा नई आलोचनात्मक भाषा रचते थे। अलका सरावगी का पहला उपन्यास जब पांडुलिपि के रूप में था, तभी परमानंद जी ने उसे पढ़ा और मुझे फोन करके उसके महत्व से अवगत कराया। देश और दुनिया के साहित्य में जो कुछ नया घटित हो रहा था, परमानंद जी निरंतर उसकी टोह लेते रहते थे और उसके छोटे-छोटे अनुवाद भी करते थे।
यहाँ मुझे गोरखपुर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति श्री बालकृष्ण राव (जो देश के अंतिम आईसीएस अधिकारियों में से एक, संस्कृत के विद्वान और प्रबुद्ध साहित्यकार थे) का एक संस्मरण याद आता है। जब मैं पडरौना में था, तब वे मुझसे मिलने आए और उन्होंने विशेष रूप से पूछा — “यह परमानंद श्रीवास्तव कौन है? मैंने उनकी एक टिप्पणी पढ़ी है; हिंदी आलोचना में इतनी दीप्त, पारदर्शी और शानदार भाषा भी हो सकती है, इसकी मैंने कल्पना नहीं की थी।” बाद में राव साहब ने परमानंद जी को बुलाकर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। सचमुच, परमानंद जी की आलोचनात्मक भाषा अपनी चमक और संवेदनशीलता में अद्वितीय थी।
निराला जी ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में घोर शारीरिक-मानसिक अस्वस्थता के बीच भी ‘पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है’ जैसी अविस्मरणीय और कालजयी कविता रची थी। इसी प्रकार, परमानंद जी ने भी अपनी अस्वस्थता और सीमाओं के बावजूद साहित्य-कर्म को कभी मंद नहीं पड़ने दिया। मराठी के दलित कवि नारायण सुर्वे की एक प्रसिद्ध कविता का मैंने अनुवाद किया था, जिसमें नेहरू जी के निधन के बाद एक साधारण आदमी दिन में लालटेन जलाकर भविष्य के अंधेरे को टटोलता है। उस अनुवाद को पढ़कर परमानंद जी ने उस पर तुरंत एक गंभीर लेख लिखा था।
मैं पूरे विश्वास के साथ यह दोहराना चाहता हूँ कि आज का जो साहित्यिक और सांस्कृतिक गोरखपुर है, इस भव्य प्रासाद की पहली नींव परमानंद श्रीवास्तव ने ही रखी थी। आज यहाँ बहुत से साथी सक्रिय हैं और उत्तम कार्य कर रहे हैं, किंतु इस वैचारिक चेतना की शुरुआत परमानंद जी ने की थी। वे इस अर्थ में एक इतिहास-निर्माता व्यक्तित्व हैं। वे किसी पुरस्कार या प्रचार के आकांक्षी नहीं रहे; चुपचाप एक कोने में बैठकर हिंदी साहित्य का पहरा देते रहे।
परमानंद जी प्रायः कहा करते थे कि गोरखपुर में उनके बौद्धिक और आलोचनात्मक आदर्श मजनूँ गोरखपुरी (अहमद सिद्दीक़) थे। मजनूँ गोरखपुरी, फ़िराक़ साहब के आदरणीय शिक्षक और उर्दू के मूर्धन्य आलोचक थे। वे इतने अग्रगामी विचारक थे कि उर्दू में आधुनिक सौंदर्यशास्त्र (जमालियात) पर सबसे पहली युगांतरकारी पुस्तक — ‘नुक़ूश-ओ-अफ़कार’/‘जमालियात’ — उन्होंने इसी गोरखपुर शहर में लगभग 1930 के आसपास लिखी थी। जब उर्दू में सौंदर्यशास्त्र की व्यवस्थित बात नहीं होती थी, तब मजनूँ गोरखपुरी ने यह काम किया था। फ़िराक़ साहब जैसा स्वाभिमानी रचनाकार भी यदि किसी के आगे पूरी निष्ठा और अदब से झुकता था, तो वे मजनूँ साहब ही थे। बाद के वर्षों में जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो ने लाहौर विश्वविद्यालय में विशेष पीठ स्थापित कर दो मूर्धन्य विद्वानों को आमंत्रित किया था, तो उनमें एक नाम फ़िराक़ गोरखपुरी का था और दूसरा मजनूँ गोरखपुरी का।
परमानंद जी का बौद्धिक गठन और उनका दुबला-पतला स्वरूप बहुत कुछ मजनूँ गोरखपुरी जैसा ही था। वे मजनूँ साहब की उसी गहरी सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टि को हिंदी आलोचना में आगे बढ़ा रहे थे।
परमानंद श्रीवास्तव को जानना वस्तुतः एक ऐसे विराट व्यक्तित्व को जानना है, जो एक साथ स्थानीय भी है और सार्वदेशिक भी। उनकी स्मृति और उनकी आलोचना-दृष्टि आने वाले समय में भी कविता की सच्ची पहचान के लिए हमारा मार्गदर्शन करती रहेगी।
इस नगर ने उन्हें भुलाया नहीं है, और न ही यह समय उन्हें कभी भुला पाएगा।
उपन्यास को आधुनिक समय में मध्यवर्ग का महाकाव्य कहा गया है। यदि उपन्यास को योरोपीय विधा के रूप में देखें तो यह एक सार्थक अवधारणा है। मध्यवर्ग के उदय का अर्थ था — एक नये व्यक्ति का जन्म। दूसरे शब्दों में एक नये यथार्थ का जन्म। जिनकी धारणा है कि प्रेमचन्द ने उपन्यास के योरोपीय ढाँचे को जस का तस स्वीकार किया, वे यह समझ पाने में असमर्थ हैं कि प्रेमचन्द किस तरह भारतीय उपन्यास की एक नयी पहचान बना रहे थे और ग्रामीण चेतना या किसान चेतना को स्वाधीनता संघर्ष की चेतना के साथ नया परिप्रेक्ष्य देने की कोशिश कर रहे थे और इस कोशिश में, वे अकेले भारतीय उपन्यासकार न थे।
‘गोदान’ को यदि किसान चेतना का महाकाव्य कहा जाता है, तो इस पृष्ठभूमि को समझने की जरूरत है। यह समझने की जरूरत है कि यूरोप में उपन्यास का जन्म जैसी स्थितियों में हुआ, वैसी स्थितियाँ हमारे यहाँ न थीं। भारतीय मध्यवर्ग का चरित्र एकदम भिन्न था। उपनिवेशवाद ने जहाँ एक ओर सुविधा भोगी विलासी जमींदार वर्ग पैदा किया, वहीं अंग्रेजी शिक्षा-सभ्यता के प्रभाव में रचे-बसे प्रायः जड़हीन मध्यवर्ग को भी जन्म दिया। अकारण नहीं, कि भारतीय उपन्यास किसान चेतना के महाकाव्य के रूप में अपनी एक अलग पहचान बना सका।
यह भी सच है कि नई शिक्षा और नई स्वाधीन चेतना के विकास के साथ मध्यवर्ग भी बहुत दिनों तक एक जैसा नहीं रह सकता था। वह भी बदल रहा था और प्रेमचन्द उसके बदलाव को भी तमाम अन्तर्विरोधों के साथ देख रहे थे और अपने उपन्यासों में तथा कहानियों में चित्रित कर रहे थे। ‘गोदान’ में गाँव और शहर दोनों की कथाएँ हैं और सप्रयोजन हैं। निश्चित रूप से होरी ही केन्द्रीय है, नायक की अवधारणा बदल कर, अपनी तमाम दुर्बलताओं में ‘गोदान’ का नायक वही है।
‘गोदान’ होरी के संघर्ष की, होरी की त्रासदी की महागाथा है। पर प्रेमचन्द का प्रयोजन उस दूसरी कथा के बगैर पूरा नहीं होता जिसमें मेहता मालती नई नैतिकता के लिए संघर्षरत दिखाई देते हैं। इसके बाद भी ‘गोदान’ विशेष अर्थ में किसान चेतना का महाकाव्य है। मुख्यतः होरी के संघर्ष की ही महागाथा है। यहाँ ‘महाकाव्य’ का भी अर्थ बदलता है और ‘नायक’ का भी। ‘उदात्त’ दोनों की शर्त है। पर यहाँ रामविलास शर्मा के इस कथन की ओर ध्यान देने की जरूरत है कि “उदात्त का सृजन केवल योद्धाओं के चित्रण से नहीं होता। सामान्य जनों के चित्रण से भी उसका सृजन संभव है।” (प्रेमचन्द और उनका युग, संस्करण 1989, पृष्ठ 244)।
‘गोदान’ महाकाव्यात्मक उपन्यास है महाकाव्य की अवधारणा बदल कर। उसमें महाकाव्य के तत्व भी हैं और ट्रैजेडी के भी। जिन्हें साधारण के मर्म का बोध नहीं है, जो क्लासिक की एक स्थिर-सी पहचान बनाकर संतुष्ट हैं, जो सामंती संस्कारों से मुक्त न होकर नयी सामाजिक हलचल से उदासीन हैं, जिन्हें शास्त्र की बद्ध धारणा नये यथार्थ को समझने के विवेक से वंचित रखती है, उनके लिए “गोदान” में “न तो महाकाव्य के औदात्य और उत्कर्ष का समारम्भ आया है और न ही गहनतम उच्छ्वास का तन्मयताकारी प्रभाव व्यक्त हुआ है।” (नंददुलारे वाजपेयी)
जो उपन्यास के ‘नायक’ में महाकाव्यों के ‘धीरोदात्त’ नायक को ही देखना चाहते हैं, उन्हें होरी की दुर्बलताओं में छिपी दृढ़ता, जिजीविषा, अपराजेयता नहीं दिखाई देगी। उन्हें ‘गोदान’ का कथानक सीधा-सादा ही जान पड़ेगा और गाँव-शहर की कथाओं का एक साथ होना शिल्पगत दोष दिखाई देगा। वे ‘गोदान’ की ढीली-ढाली मंथर गति से चलने वाली कथा में एक अलग ढंग का गाथात्मक स्पेस या स्थापत्य नहीं देख सकेंगे।
नंददुलारे वाजपेयी ‘गोदान’ को महाकाव्यात्मक उपन्यास मानने से इनकार करते हैं क्योंकि इसमें कोई बड़ी घटना, बड़ा संघर्ष नहीं है, राष्ट्रीय संघर्ष या राष्ट्रीय चेतना का कोई बड़ा स्वप्न नहीं है। ऐसा कुछ नहीं है, जहाँ से “वीर चरित्रों का उत्थान या पतन हुआ करता है।” नंददुलारे वाजपेयी के ही शब्द हैं : “महाकाव्य का सम्पूर्ण वातावरण वीर भावना से ओत-प्रोत होने के कारण ही उसे राष्ट्रीय जीवन और आदर्शों का प्रतिबिम्ब या मुकुर कहा जा सकता है ‘गोदान’ में इस प्रकार की वीर भावना का अभाव है।”
दूसरी ओर रामविलास शर्मा होरी के जीवन की सब दुर्बलताएँ — समझौता, झूठ, छल, स्वार्थ, अंधविश्वास, खुशामद की प्रवृत्ति, झूठी मर्यादा का मोह — गिने जाते हैं पर अंत में लिखते हैं — “होरी का चरित्र भारत के अजेय किसान का चरित्र है। ‘गोदान’ उसके भगीरथ प्रयत्न की गाथा है।” यह है आलोचना-दृष्टि का अंतर।
नंददुलारे वाजपेयी को ‘गोदान’ में होरी की दुर्बलताओं के साथ सब कुछ साधारण दिखाई देता है क्योंकि सब मिलाकर “वीरभाव” का अभाव है। आलोचक रामविलास शर्मा को होरी की दुर्बलताओं क्षुद्रताओं के बीच अक्षय जीवनीशक्ति दिखाई देती है, जिजीविषा दिखाई देती है। कुछ ऐसा दिखाई देता है, कि साधारण की महानता का अनुभव किया जा सके। उन्हें याद आते हैं — प्रेमचन्द के शब्द : “जीवन के सारे संकट सारी निराशाएँ मानो उसके चरणों पर लोट रही थीं। कौन कहता है जीवन-संघर्ष में वह हारा है। यह उल्लास यह गर्व यह पुलक क्या हार के लक्षण हैं? इन्हीं हारों में उसकी विजय है। उसके टूटे-फूटे अस्त्र उसकी विजय-पताकाएँ हैं।”
उपन्यास को एक विधा के रूप में महान खोज कहने का विशेष अर्थ है। उसे ईश्वर विहीन दुनिया का महाकाव्य (लूकाच) कहने की अपनी सार्थकता है। वह महाकाव्य का एक आधुनिक विकल्प है। वह व्यक्ति का, समाज से जीवंत उलझाव के तमाम लक्षणों के साथ एक गद्य-वृत्तान्त है। वह पतनशीलता के दौर में भविष्य के लिए एक स्वप्न भी है। मूल्यों की नयी खोज। मूल्य रहित समाज में। लूकाच के लिए महाकाव्य और उपन्यास जैसे रूप एकदम अलग-अलग नहीं हैं। विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों में वे एक दूसरे में पुनर्जीवित हो सकते हैं। मनुष्य की नियति के निरूपण के बहाने वे दोनों साहित्य-रूप विशेष प्रकार के समाज की विलक्षणताओं की प्रस्तुति में सहायक हो सकते हैं।
उपन्यास के महाकाव्यत्व पर विचार करते हुए लूकाच के साथ बाख्तिन की व्याख्याएँ महत्वपूर्ण हैं। लूकाच उपन्यास को वृत्तान्त के रूप में परिभाषित करते हुए स्वीकार करते हैं कि उसे विगत या अतीत में स्थित होकर भी उस वर्तमान को आत्मसात कर लेना है जिसमें वृत्तान्त का वाचक मौजूद है। इस कोशिश में उपन्यास महाकाव्य के निकट जा पहुँचता है जिसके लिए समय एक पूर्णतर वृत्त है। साथ ही लूकाच समय को एक प्रक्रिया या अवधि के रूप में भी देखते हैं। मानते हैं कि वास्तविक समय ही उपन्यास-रूप को निर्धारित या संगठित करता है। उपन्यास में ही समय और रूप की द्वन्द्वात्मकता तो अर्थवान बनी रहती है जबकि महाकाव्य में समय स्थगित रहता है — स्थिर और अपरिवर्तित। बाख्तिन की दृष्टि में महाकाव्य में समय सुदूर वर्तमान से विच्छिन्न और स्थगित रहता है, जबकि उपन्यास में वह लगातार परिवर्तन की प्रक्रिया में है। उपन्यास को हम कई सम्भावनाओं में कई कोणों से देख सकते हैं। ‘गोदान’ उपन्यास है, महाकाव्य नहीं। विशेष अर्थ में ही कहा जा रहा है कि वह महाकाव्यात्मक उपन्यास है।
‘गोदान’ किसानचेतना का महाकाव्य है। साथ ही उसकी रचना-वस्तु में स्त्रीचेतना निरन्तर मौजूद है। बल्कि ये दोनों चेतनाएँ मिलकर ‘गोदान’ के फलक को सम्भावनापूर्ण व्याप्ति या विस्तार देती हैं। ‘गोदान’ जिस गहरे अर्थ में ट्रैजेडी है, उसकी व्याख्या करते हुए रामविलास शर्मा के शब्द हैं : “गोदान ट्रैजेडी है। यहाँ दो मुख्य पात्र हैं — धनिया और होरी। एक की मृत्यु होती है, एक की नहीं होती। ट्रैजेडी केवल एक के चरित्र से नहीं, दोनों के चरित्र मिलाकर बनी है।” जिन्हें लगता है होरी की मौत न तो हीरोइक है, न घनीभूत त्रासदी की अनुभूति दे पाती है, उन्हें होरी का संघर्ष मामूली जान पड़ता है। रोज-रोज के खटने में उन्हें संघर्ष नहीं दिखाई देता। उपन्यास में बहुतों को क्रांतिकारी नायक का इन्तजार रहा है। साधारण दुःख और संघर्ष में, वह भी अकेलेपन के संघर्ष में उन्हें नायकत्व नहीं दिखाई देता। ‘गोदान’ को समग्रता में, और एक बार आरम्भ और अन्त के प्रसंगों को समक्षीकृत (juxtaposed) करके पढ़ेंगे तो होरी की वास्तविक पीड़ा और त्रासदी का आशय समझ में आयेगा।
उपन्यास के अन्त में होरी की मृत्यु का मार्मिक प्रसंग है। वह पाठक को विचलित करने वाला है। विडम्बना यह है कि अन्त में घटित होने वाली मृत्यु का पूर्वाभास आरम्भ में ही मौजूद है और वह कम विचलित करने वाला नहीं है। इस मृत्यु-क्षण तक जीवन संघर्ष स्थगित नहीं है। प्रेमचन्द लिखते हैं — “आज होरी खुदाई करने चला, तो देह भारी थी। रात की थकान दूर न हो पाई थी; पर उसके कदम तेज थे और चाल में निर्द्वन्द्वता की अकड़ थी।” एक तो होरी के किसान से मजदूर होने का संकेत है। दूसरे यह कि मृत्यु जब एकदम सामने थी होरी दिखाना चाहता था कि पराजय वह नहीं मानता। आँखों के सामने अँधेरा है और मृत्युपूर्व की स्मृतियाँ हैं जीवनासक्ति की निरन्तरता की झलक देने वाली हैं। “उसकी आँखें बन्द हो गईं और जीवन की सारी स्मृतियाँ सजीव हो-होकर हृदय-पट पर आने लगीं; लेकिन बेक्रम, आगे की पीछे, पीछे की आगे स्वप्न-चित्रों की भाँति बेमेल, विकृत और असम्बद्ध, वह सुखद बालपन आया, जब वह गुल्लियाँ खेलता था और माँ की गोद में सोता था। फिर देखा, जैसे गोबर आया है और उसके पैरों पर गिर रहा है। फिर दृश्य बदला, धनिया दुलहिन बनी हुई, लाल चुँदरी पहने उसको भोजन करा रही थी। फिर एक गाय का चित्र सामने आया, बिल्कुल कामधेनु-सी। उसने उसका दूध दुहा और मंगल को पिला रहा था कि गाय एक देवी बन गई और . . . .।” यह है मृत्यु में जीवन का स्मरण। होरी ही मृत्यु को निकट नहीं देख रहा था, धनिया भी देख रही थी क्योंकि उसने “मौत की सूरत” देखी थी। उसने मृत्युएँ देखी थीं। उधर होरी के लिए “आग दहकने वाली थी। धुआँ शांत हो गया था।” ‘गो-दान’ की रीति-भर शेष थी पर उसे होना और ही तरह से था — “धनिया यन्त्र की भाँति उठी, आज जो सुतली बेची थी, उसके बीस आने पैसे लायी और पति के ठंडे हाथ में रखकर सामने खड़े दातादीन से बोली — महराज, घर में न गाय है, न बछिया, न पैसा। यही पैसे हैं, यही इनका गोदान है। और पछाड़ खाकर गिर पड़ी।” यह अन्त में घटित मृत्यु का प्रसंग था। एकदम शुरू के दाम्पत्य जीवन के विनोद-क्षण में जैसे मृत्यु का संकेत चुपचाप आ जाता है। होरी को राय साहब के यहाँ जाना था। धनिया ने सजने सँवरने को लेकर परिहास किया था, कि कोई साली सरहजें रीझने वाली नहीं हैं। एक बार होरी बन रहा था कि अभी तो उम्र चालीसवें पर है और मर्द तो साठे पर पाठे होते हैं। धनिया की कठोर विक्षुब्ध प्रतिक्रिया थी — “जाकर सीसे में मुँह देखो। तुम जैसे मर्द साठे पर पाठे नहीं होते। दूध घी अंजन लगाने तक को तो मिलता नहीं, पाठे होंगे।” प्रेमचन्द लिखते हैं : “होरी की वह क्षणिक मृदुता यथार्थ की इस आँच में जैसे झुलस गई। लकड़ी सम्भालता हुआ बोला — साठ तक पहुँचने की नौबत न आने पाएगी धनिया। इसके पहले ही चल देंगे।” जीवन में मृत्यु ऐसे भी आती है — ‘आशंका’ बन कर और अन्त को देखें, तो मृत्यु में जीवन भी आता है। कितने ही मधुर प्रीतिस्निग्ध ‘स्मरण’ बनकर। दोनों प्रसंगों को मिलाकर पढ़ें तो जैसे ‘गोदान’ की महाकाव्यात्मक संरचना में प्रवेश करने का कोई अज्ञात अन्तर्मार्ग मिल गया हो। दोनों कथाओं के अलग-थलग होने को जहाँ नन्द दुलारे वाजपेयी जैसे आलोचक शिल्पगत दोष मानते हैं, उसी बिखराव को, उसी ढीले-ढाले कथा विन्यास को नलिनविलोचन शर्मा उपन्यास की महाकाव्यात्मक का आधार मानते हैं।
रमेशचन्द्र शाह ने ‘गोदान’ की संरचना का मर्म स्पष्ट करते हुए कहा है कि इस अपनी सबसे अधिक महत्वपूर्ण कृति में प्रेमचन्द ने अन्य औपन्यासिक नायकों की तुलना में एकदम अ-नायक जैसा नायक चुना है जो हमारे भीतर के बहुत सारे तार झंकृत कर जाता है। होरी की मृत्यु कुछ इस तरह घटित होती है कि वह सामूहिक ट्रैजेडी जान पड़ती है। प्रेमचन्द की सामाजिक चेतना बौद्धिक स्तर पर अर्जित-जैसी चीज़ नहीं है। वह सहज जीवन-बोध से ही स्वतः स्फूर्त है। इस उपन्यास तक आते-आते प्रेमचन्द ने उपन्यास का स्वरूप और परिक्षेत्र इतना विस्तृत कर लिया है कि बहुत सारी सामाजिक समस्याएँ उसमें एक साथ अभिव्यक्ति पा सकती हैं। महत्वपूर्ण यह है कि अपने समय तक के सामाजिक उपन्यास की सभी सम्भावनाओं का उपयोग प्रेमचन्द कर चुके थे। इस दृष्टि से ‘गोदान’ की ढीली-ढाली कथाशैली की सार्थकता समझी जा सकती है।
होरी की दुर्बलताएँ लगातार प्रेमचन्द की निगाह में हैं, उन्हीं के बीच उसकी आन्तरिक गुणवत्ता भी प्रकट होती है। प्रेमचन्द के शब्द हैं — “यह केवल स्वार्थ सिद्धि थी और यह कोई बुरी बात न थी। इस तरह का छल तो वह दिन रात करता रहता था। घर में दो चार रुपये पड़े रहने पर भी महाजन के सामने कसमें खा जाता था कि एक पाई भी नहीं है। सन को कुछ गीला कर देना और रूई में कुछ बिनौले भर देना उसकी नीति में जायज़ था।”
आगे वे कहते हैं — “किसान पक्का स्वार्थी होता है, इसमें सन्देह नहीं। उसकी गाँठ से रिश्वत के पैसे बहुत मुश्किल से निकलते हैं, भाव-ताव में भी वह चौकस होता है, ब्याज की एक-एक पाई छुड़ाने के लिए वह महाजन की कई घण्टों चिरौरी करता है, जब तक पक्का विश्वास न हो जाय, वह किसी के फुसलाने में नहीं आता, लेकिन उसका सम्पूर्ण जीवन प्रकृति से स्थायी सहयोग है।”
प्रेमचन्द खास तौर पर बताते हैं कि होरी के छोटे-छोटे स्वार्थ हैं पर कुत्सित स्वार्थ के लिए उसके यहाँ जगह नहीं है। जैसे, “होरी किसान था और किसी के जलते हुए घर में हाथ सेंकना उसने सीखा ही न था।” होरी किसान है और गाय ही उसके लिए सबसे बड़ी लालसा है। गाय का अर्थ उसके लिए कामधेनु ही है। भाई के ही विष देने से गाय की मृत्यु हो जाती है। होरी को ‘मरजाद’ की चिंता है इसलिए उसका नाम भी नहीं ले सकता। भाई को बचाने के लिए वह झूठ बोलता है, अपने बेटे की क़सम खाता है, और सबसे पहले धनिया की निगाह में गिर जाता है।
होरी के पूरे जीवन में ऐसे क्षण आते ही रहे हैं जब वह ठगा जाता रहा है। आत्माधिक्कार, आत्मग्लानि, आत्मभर्त्सना के स्वर में वह बार-बार अपने को लताड़ता है। क़र्ज़ में डूबा हुआ है और क़र्ज़ हमेशा बढ़ता ही जाता है। एक दिन गोबर-झुनिया साथ छोड़ जाते हैं। शहर चले जाते हैं। किस तरह होरी-धनिया ने झुनिया को स्वीकार किया था। आज दोनों अकेले हो गये हैं। गोबर-झुनिया के बच्चे के लिए वे हर क्षण चिन्तित थे। जैसे जीवन का आधार छिन गया हो।
इस चरम दुख में पति-पत्नी को बचाता है — क्षण भर का जीवन-विनोद! प्रेमचन्द लिखते हैं — “विनोद में दुःख उड़ गया। वही उसकी दवा है। धनिया प्रसन्न होकर रूपा के बाल गूँथने बैठ गई, जो बिल्कुल उलझ कर रह गये थे और होरी खलिहान चला। रसिक बसंत सुगंध और प्रमोद और जीवन की विभूति लुटा रहा था, दोनों हाथों से दिल खोलकर। कोयल आम की डालियों में छिपी अपनी रसीली, मधुर, आत्मस्पर्शी कूक से आशाओं को जगाती फिरती थी। महुए की तालियों पर मैनों की बरात-सी लगी बैठी थी। नीम और सिरस और करौंदे अपनी महक में नशा-सा घोल देते थे। होरी आमों के बाग में पहुँचा, तो वृक्षों के नीचे तारे-से खिले थे। उसका व्यथित, निराश मन भी इस व्यापक शोभा और स्फूर्ति में आकर गाने लगा। — हिया जरत रहत दिन रैन!” प्रकृति से स्थायी सहयोग — यही है होरी जैसे किसान की अविराम जिजीविषा का रहस्य!
‘गोदान’ के महाकाव्यत्व का मुख्य आधार है — होरी का संघर्ष और उसकी त्रासदी — जो ग्राम कथा का हिस्सा है। पर होरी की नियति न सिर्फ रायसाहब से, बल्कि कई अर्थों में उस शेष समाज से जुड़ी हुई है जो शहरी कथा का हिस्सा है, क्योंकि गोबर उसी का अंश है जो जड़मूल से अलग उसी दुनिया में जा बसता है। दोनों कथाओं की संश्लिष्टता ही ‘गोदान’ की महाकाव्यात्मक व्याप्ति का आधार है।
प्रेमचन्द का अपना कथा प्रयोजन भी अकेले होरी से सिद्ध नहीं होता। रामविलास शर्मा का यह कथन इस प्रसंग में बहुत महत्वपूर्ण है — “ ‘गोदान’ के किसी एक पात्र को प्रेमचन्द का प्रतिनिधि नहीं कहा जा सकता, लेकिन अगर मेहता से होरी को जोड़ा जा सके तो जो व्यक्ति बनेगा, वह बहुत कुछ प्रेमचन्द से मिलता-जुलता होगा।”
मेहता के होरी से जुड़ने के और भी आधार हैं। रामविलास शर्मा लिखते हैं — “मेहता किसानों के काफी नज़दीक पहुँचते हैं। उनसे उन्हें सच्ची सहानुभूति है। फिर भी दोनों एक होकर आगे बढ़ने का रास्ता नहीं ढूँढ़ पाये। वे सब ताक़तें मौजूद हैं जो राय साहब की धूर्तता, महाजनों के शोषण और इनके सरपरस्त विलायती साहबों के स्वार्थों से देश को मुक्त कर सकती हैं, लेकिन एकता न होने से होरी बेचारा अकेला पड़ जाता है। ‘गोदान’ के बाद अगला क़दम यही हो सकता है कि मेहता और होरी — जैसे लोग अपना एका मजबूत करके राय साहब और अनेक विलायती प्रभुओं के जाल को छिन्न-भिन्न कर दें।”
वास्तविकता यह है कि शहरी कथा की चरित्र-संरचना कहीं अधिक जटिल है। सेमरी में रायसाहब रहते हैं जिनके साथ शहरी लोगों का जुड़ाव है इसलिए शहरी संस्कृति के विभिन्न वर्गीय प्रतिनिधि सेमरी को और तरह का गाँव या क़स्बा बनाये हुए हैं। शरू में प्रेमचन्द ने वेलारी सेमरी को अवध प्रान्त का गाँव ही कहा है। गाँव और शहर के बीच के खन्ना, रायसाहब, तंखा के चरित्र सीधे सरल चरित्र नहीं हैं। खन्ना मजदूरों के प्रति प्रेम दिखाते हैं पर उन्हें हड़ताल करते हुए देखना उनके लिए सहा नहीं है। रायसाहब होरी से कहते जरूर हैं कि एक दिन तुम्हारी आहों का दावानल हमारे वर्गीय ढाँचे को ध्वस्त कर देगा पर भीतर-भीतर शोषण का उनका शिकंजा और अधिक कसता चला जाता है।
जिस भद्र वर्ग के काहिली से भरे मनोरंजन और लीला विलास के व्यंग्य चित्र यहाँ उभरते हैं, उन्हीं की जड़ में महाजनी सभ्यता का जाल भी फैला हुआ है। शोषक-शोषित वर्ग जैसे नाभिनालबद्ध हैं एक दूसरे को बरदाश्त करते हुए और एक दूसरे को पोषण देते हुए। इसी समाज के बीच मेहता मालती जैसे आरम्भ में छिछले सामान्य दिखते चरित्रों का जैसे आगे चलकर एक नया जन्म होता है। इसी को कहते हैं — व्यक्तित्वांतरण। शंभुनाथ ने मेहता मालती में जिस नयी नैतिकता के उदय की ओर संकेत किया है — वह इसी सन्दर्भ में। प्रेम उनके लिए एक नया अनुभव है, एक नया जीवन-अभिप्राय। एक नयी स्वतन्त्रता। इसके लिए उन्हें कई-कई प्रयोगों और परीक्षणों से गुज़रना पड़ता है।
ये तमाम प्रसंग और ब्यौरे एक दूसरी दुनिया के ब्यौरे हैं जिसे हम शहरी कथा कह रहे हैं या भद्रलोक के शोषण कुचक्र पाखण्ड, विलास, महाजनीवृत्ति की कथा कह रहे हैं। यह दुनिया ग्राम-कथा की अर्थात् होरी की कहानी से एकदम अलग-थलग नहीं है, यद्यपि दिखती है अलग ही। उपन्यास का महाकाव्यत्व यहाँ दोनों के जटिल संगुम्फन से सम्भव होता है। एक महीन जाल की तरह व्याप्त अन्तः संयोजन से। एक दो प्रसंग ध्यान में आते हैं — शहरी भद्रलोक की सभा में खेले जा रहे मेहता के स्वाँग को होरी अचानक ध्वस्त कर देता है जब कि प्रकृत्या वह व्यवस्था की दीवार को भेद पाने में अन्त तक अक्षम असमर्थ बना रहता है। तफ़रीह के लिए मेहता के साथ ग्रामलोक में विचरण करती मालती को चुनौती मिलती है उस काली युवती से — जिस पर मेहता क्षणभर के लिए मुग्ध दिखाई देते हैं।
उपन्यास का महाकाव्यत्व सामान्य ब्यौरों में भी देखा जाता है पर उससे कहीं अधिक उन विशेष मर्मस्पर्शी स्थलों में — जहाँ उपन्यासकार चरित्रों के मर्म में प्रवेश करने के लिए अपेक्षित विशाल सहृदयता का प्रमाण दे पाता है। इस दृष्टि से दो महत्वपूर्ण स्थल ध्यान देने योग्य हैं जिनकी ओर प्रायः रसज्ञ पाठकों की निगाह भी नहीं जाती है :
एक वह क्षण जब झुनिया घर में प्रवेश और स्वीकृति चाहती है और होरी धनिया तय करके बैठे हैं कि आने नहीं देना है। धनिया दृढ़ है कि उसके घर में धर्मभ्रष्ट छतीसियों के लिए जगह नहीं है। होरी भी तय कर चुका है कि आते ही उसे घसीट कर बाहर कर देगा। पर जैसे ही वह क्षण आता है धनिया का विरोध ढह जाता है। उसे ख्याल आता है कि झुनिया गर्भवती भी है। वह होरी को बरजती है — “तुम उसका हाथ पकड़ोगे तो वह चिल्लायेगी — इतनी रात गये अँधेरे सन्नाटे में जायेगी कहाँ . . . .।” प्रेमचन्द क्रमशः इस भाव परिवर्तन के मनोविज्ञान में प्रवेश करते हैं। प्रेमचन्द लिखते हैं — “दोनों द्वार के सामने पहुँच गये। सहसा धनिया ने होरी के गले में हाथ डाल कर कहा — देखो तुम्हें मेरी सौंह, उस पर हाथ न उठाना। वह तो आप ही रो रही है। भाग की खोटी न होती तो यह दिन ही क्यों आता।” संकेत झुनिया की युवावस्था में घटित वैधव्य के दुर्भाग्य की ओर है। प्रेमचन्द यहाँ कलात्मक ऊँचाई का प्रमाण देते हैं। उनके शब्द हैं — “होरी की आँखें आर्द्र हो गईं। धनिया का मातृस्नेह उस अँधेरे में भी जैसे दीपक के समान उसकी चिन्ता जर्जर आकृति को शोभा प्रदान करने लगा। दोनों ही के हृदय में जैसे अतीत यौवन सचेत हो गया। होरी की इस बीत-यौवना में भी वही कोमल-हृदय बालिका नज़र आई जिसने पच्चीस साल पहले उसके जीवन में प्रवेश किया था।” यह एक सम्पूर्ण चाक्षुष (Visual) बिम्ब जैसे उपन्यासकार की प्रायः अलक्षित कविदृष्टि का प्रमाण हो।
दूसरा वह क्षण, जब मातादीन-सिलिया के बच्चे की मौत हो चुकी है। मातादीन साहस नहीं जुटा पाता कि सिलिया के साथ रह सके। सिलिया के लिए काम पर जाना अनिवार्य है क्योंकि तमाम दुःखों अभावों के बाद भी जीवन ख़त्म नहीं हो जाता। प्रेमचन्द लिखते हैं :
प्रेमचन्द जो पुरुषोचित (Masculine) संवेदना के पक्षधर लेखक हैं किस तरह एक स्त्रीवादी (Feminist) गहन अभिप्राय (Motif) या पर्यवेक्षण तक जा पहुँचे हैं, देखने की चीज है। उपन्यास का महाकाव्यत्व इन महत्वपूर्ण क्षणों में आँका जा सकता है।
नामवर सिंह ने 1935-’36 की भारतीय राजनीति के सन्दर्भ में ‘गोदान’ के एक तरह के नये पाठ का प्रस्ताव किया है। कैसी है भारतीय राजनीति — कैसी है आजादी की लड़ाई — असेम्बली में सीटों की छीना-झपटी, आपस का मनमुटाव, वैचारिक पतन की पराकाष्ठा — जिसकी झलक, नेहरू की आत्मकथा के आखिरी अध्याय में है। कांग्रेस की भूमिका क्या है ! एक तरह का गतिरोध। जब, रात का अँधेरा गहरा होता जाता है और रोशनी की कोई उम्मीद नहीं है। यह समय है जब तल्खी और कड़वाहट के बावजूद ‘गोदान’ एक सम्भावना है। ‘गोदान’ उपन्यास प्रेमचन्द सरीखे कथाकार की पुकार के रूप में आता है कि अन्धकार दूर हो। आश्चर्य नहीं कि ’35-36 के आस-पास की कतिपय अन्य महत्वपूर्ण कृतियाँ भी रात के अँधेरे का आभास देती हैं।
अन्त में महाकाव्यात्मक उपन्यास के रूप में ‘गोदान’ का महत्व निर्विवाद है। ढीले-ढाले कथाबन्ध के कलेवर में वह एक अधिक गहरे अन्तर्गठन का उदाहरण है। दुर्बलताओं से घिरे अ-नायक जैसे चरित्र (होरी) में वह एक नये नायकत्व का संकेत है। किसान-चेतना का महाकाव्य होते हुए भी वह स्त्रीचेतना की अभिव्यक्ति के लिए नया ‘स्पेस’ रचने वाला उपन्यास है। भारतीय मध्यवर्ग, शिक्षित और सम्पन्न मध्यवर्ग की कमज़ोरियों को संक्रमण कालीन समस्याओं की विडम्बनाओं के साथ प्रत्यक्ष करने वाला उपन्यास है। मानव स्वभाव के रहस्यों के उद्घाटन की दृष्टि से भी यह एक तरह की कलात्मक ऊँचाई का आभास कराने वाला उपन्यास है। वह प्रेमचन्द की उस विशाल सहृदयता का प्रमाण है जो कमज़ोरियों को भी सहानुभूति देने में समर्थ है। ‘गोदान’ में भारतीय समाज के एक तरह के उद्वेलन का आभास तो है ही, यहाँ व्यक्तिवाद भी, मुक्तिबोध के शब्दों में एक वेदना के रूप में सामाजिक गर्भितार्थ लिए हुए है।
यह आत्मकथ्य वहाँ से शुरू करना चाहता हूँ जहाँ एकदम आरंभिक शिक्षा हुई। बाँसगाँव कस्बे में पिता मुख्तार थे। काफी बड़ा घर कस्बे के एक छोर पर। घर से ज्यादा उसे अहाता कहेंगे। नाशपाती और अनार तक के पेड़ थे अहाते में। अनार के तो कुछ लाल पीले कच्चे बीमार फल दिखे भी। नाशपाती के लम्बे पेड़ को फलते कभी न देखा। सुंदर–सुगठित, पर फलहीन। बचपन के स्वप्नाविष्ट मन को कभी उस पेड़ से बाँसुरी-की-सी धुन सुनाई पड़ती। कस्बे में प्राइमरी स्कूल तो था पर शुरुआत वहाँ से नहीं हुई। कारण कि जो अध्यापक—(नाम था काशी सिंह, आगे चलकर वे जिला स्तर के कांग्रेसी कार्यकर्ता हुए। यह इसलिए याद है कि एक बार सभा में कमलापति त्रिपाठी जैसे बड़े नेता को, जो शायद मेरे उस समय के वक्तव्य से प्रभावित दिखे होंगे, मुझे गर्वोक्ति के साथ अपना पुराना शिष्य बताते सुना था। यह बहुत आगे की बात है जब मैं सेंट एण्ड्रयूज़ कॉलेज में अध्यापक हो चुका था और छात्र संघ में प्रिंसिपल द्वारा मनोनीत सलाहकार था!) विद्यारंभ से ही मुझे घर पर पढ़ा रहे थे वे कुछ मील दूर के गाँव साईंताल में थे। मध्यवर्गीय कायस्थ परिवार में भी एक तरह के सामंतवाद की ठसक थी कि एक नौकर कंधे पर बिठाकर स्कूल ले जाता था और शाम को घर ले आता था। भाई दो साल बड़े थे। शायद पैदल चल लेते होंगे। यह क्रम साल डेढ़ साल ही चला। फिर पिता ने अपने प्रभाव से अध्यापक काशी सिंह का तबादला बाँसगाँव में ही करा लिया। साईंताल का स्कूल दो कारणों से याद आता है। एक तो वहाँ ‘धूपघड़ी’ का होना जो एक चमत्कार से कम न था। रोज देर तक मैं उसके इर्द गिर्द बना रहता कि जैसे कोई और गोपन रहस्य उद्घाटित ही होने वाला है। दूसरे एक शाम हम बहुत भयानक आँधी में बाग के उस स्कूल में भटक गये और यह भी चमत्कार से कम न था कि स्कूल की ही हमसे कुछ बड़ी उम्र वाली लड़की ने हमें सीधे ले जाकर अपने घर में छिपा लिया था। हम उसे बहुत दिनों तक ‘प्राणरक्षक’ की तरह याद करते रहे।
हम दो भाइयों की प्रकृति एक दूसरे से काफी भिन्न रही होगी। वे आसानी से दोस्त बना लेते और कबड्डी फुटबाल या हाकी खेलने का जुगाड़ बिठा लेते। जब–तब हाथ–पाँव में चोट लिए, पट्टी बँधवाये घर लौटते। पढ़ाई में कमजोर। पिता से अक्सर पिटते रहते। मैं चुप्पा। सुनसान में अकेले यहाँ–वहाँ, पेड़–पौधों के बीच। कभी किसी सूनी पुलिया पर बैठता या माँ के आस पास तरह–तरह के काम से आने वाली लड़कियों के बारे में सोचता। उम्र में बड़ी दिखने वाली लड़कियाँ जब ठीक बाजार से निकलतीं या स्कूल से थकी सुस्त शालीन लौटतीं वे मुझे रहस्यलोक की ही चीज जान पड़तीं। यह उत्सुकता इसलिए भी कि मेरी कोई अपनी बहन न थी। कस्बे के थोड़े उजड्डु, उदंड किस्म वाले माहौल से अरूचि मुझमें शुरू से ही थी। इसलिए दसवीं के बाद शहर पढ़ाई के लिए निकला तो एकदम ‘शहरी’ हो गया। माँ जब तक थीं तब तक बाँसगाँव नहीं छूटा। जब पिता अकेले हो गये तो मैं और ज्यादा घबराया हुआ घर आता और अम्मा के कमरे में पड़ा रहता। फिर वहाँ जाना और कम हो गया। उपन्यासकार श्रीलाल शुक्ल को उन दिनों का कुछ–कुछ पता था। अपनी शुरू की पोस्टिंग में वे एस०डी०अम० बाँसगाँव थे। ‘निकष’ बहाने उनसे नया नया परिचय था। कई बार उनके साथ ‘पर्यटक’ भाव से ही पिता से मिलने जाता और लौट आता। पिता के साथ अधिक समय बिताना कठिन था।
स्कूल के शुरू के दिनों का ही एक और अनुभव दहशत पैदा करने वाला है। यह घटना आजादी के पहले की होगी। जहाँ तक याद है कि किसी अंग्रेज अफसर के मुआइने पर आने की बात सनसनी की तरह फैली थी। घोड़ों पर पुलिस के दस्ते सड़कों पर निकले होंगे। अचानक स्कूल में छुट्टी की घंटी बजी होगी और हमें तुरंत घर पहुँचने को कहा गया होगा। यह आँधी–अंधड़ में फँस जाने–जैसा ही दृश्य था। भाई मुझसे फिर अलग हो गये और मुझे गाँव की एक ‘सहुआइन’ ने देर तक छिपा कर रखा था। बाद में जाना कि वह माँ की सहेली थी। और कभी जब आर्थिक तंगी के दिन थे माँ ने उसी के जरिए अपने जेवर वगैरह बेचकर हमारी आगे की पढ़ाई का खर्च निकाला था।
वही पिता जो शास्त्रीय संगीत में विख्यात थे, आत्मविस्मृति की हद तक डूबे हुए थे, रोज़ जिनकी महफ़िलें जमती थीं। खाना–पीना! रागरंग। शाम को देर तक ‘ठंडई’ घुटती। माँ थीं अकेली और दिन–रात खटती रहतीं। पढ़ाई के दिनों में ही पिता का वह काल्पनिक वैभव भी उजड़ते देखा है। एक दिन ‘सधुवा’ कर वे हरिद्वार चले गये थे। ये दिन माँ ने कैसे काटे होंगे, यह सोचकर भी रुलाई आती है। एक दिन वे उसी घर में बीमार हुईं। पिता की सनक अब सिर्फ प्राकृतिक चिकित्सा पर भरोसा करने वाली।
माँ की हालत बिगड़ती जा रही थी पर डाक्टर को दिखाने की मनाही थी क्योंकि डाक्टरों के तो बस चोंचले हैं। हैं वे किसी काम के नहीं। प्राकृतिक चिकित्सा में ही रोग को जड़ से जाना है। रोग तो गया नहीं।
इस अनैतिक प्रयोग में माँ ही चली गयीं। मुझे यह मृत्यु से अधिक हिंसा लगती है। शनिवार–शनिवार उन्हें देखने आता था। एक शनिवार को पहुँचा तो रात हो चुकी थी। माँ बुखार में तप रही थीं। बुखार में खाना देना मना था। भूख मुझे लगी थी। किसी तरह चूल्हा जला। पिता से अब अ–संवाद जैसी ही स्थिति थी। आ गया हूँ। चला जाऊँगा—यह वे जान लेते। साधना उनकी ऐसी कि कभी दूध पर रह गये। कभी फल पर। अन्न की पोषकता के बारे में तो जैसे उनका संदेह प्रबल होता जा रहा हो। जब मैंने कुछ पकी–अधपकी रोटिया सेंक लीं तो माँ के पास गया। पूछा कि— लोगी! ‘हाँ’ उन्होंने इशारे से कहा। डरते–डरते (कि पिता को पता न चल जाय!) उन्हें दो रोटियाँ खिला सका। इसी बीच पिता की आहट भी लेता रहा। और सुबह शहर आ गया क्योंकि कालेज में अल्पकालिक व्यवस्था में पढ़ाने लगा था। दूसरे शनिवार को नहीं निकल सका। पहुँचा इतवार को। और घर पहुँचते–पहुँचते लोगों की निगाह से जान गया कि वे नहीं हैं। यह शायद सबसे बड़ी क्षति थी जीवन की और मैं बहुत दिनों तक यह सारा प्रसंग भूल नहीं पाया।
मेरी कविताओं में माँ के तमाम चित्र हैं। कई–कई अनुभव प्रसंग। और यह सिलसिला कायम है। ‘नीली ब्राह्मणी चिड़िया’, ‘माँ का चेहरा’ और भी कई कविताएँ। पिता से हमेशा एक तनाव भरा रिश्ता बना रहा। उसकी परिणति ‘मृत्यु’ कहानी में है जो उनकी मृत्यु पर ही लिखी गयी। जैसा, पहले बताया, पिता माँ के स्वास्थ्य के साथ ही प्रयोग नहीं कर रहे थे, अपने साथ भी कर रहे थे। मैं हमेशा उनका प्रतिपक्ष था। उनकी हम दोनों भाइयों के लिए एक कठोर आचार संहिता थी। वे उन्हें बर्दाश्त करते चले गये। मैं हमेशा चुप–चुप और इनकार में था। मसलन् लड़के लड़कियों से मिलें, यह उनकी समझ या स्वीकृति के परे था। हम उनके सामने किसी लड़की की ओर सीधे देख भी नहीं सकते थे।
उनके सामने ही इस तरह निकला जैसे कि वह मेरी ‘मित्र’ हो। कस्बे की जीवन-शैली में तो यह कल्पनीय था। ऐसा बहुत कुछ देख लिया उन्होंने कि मेरा उनसे एक असहज सम्बन्ध बना। इस बीच मेरा विवाह हुआ। उन्हीं की मर्जी से। पर काफी टालमटोल के साथ। गाँव-कस्बे में अकेले। अपने ही सीमित साधनों पर निर्भर। खान-पान में अपनी जिद। अपना ढंग। उपवास से ही अपने को शुद्ध मानते। यह अतिचार बहुत दिनों तक चल नहीं सकता था।
एक दिन वे विक्षिप्त घर से निकले होंगे। घर खुला छोड़कर। बिना टिकट बस में बैठे होंगे। कंडक्टर से कहासुनी हुई होगी। किसी दूसरे ने उनके लिए टिकट खरीदा होगा। और मैं इतना ही जान सका कि कोई परिचित उन्हें मेरे यहाँ छोड़ गये हैं। विक्षिप्तता काफी हद तक हिंस्र उन्माद का रूप ले चुकी थी। उन्हें सँभाल पाना कठिन था।
उन्हें नियंत्रित करने के लिए हमने काफी प्रयोग किये। वे ‘अयोध्या’ जाना चाहते थे। हालाँकि, उन्हें पता न था कि वे कहाँ जाना चाहते थे। पत्नी ने साहस जुटाया। वे उन्हें ‘अयोध्या’ लिवा गयीं। वे गाँव लौटना चाहते थे। वे राशन पानी जुटाकर उनके साथ गाँव चली गयीं। हमारा पितृ ऋण उन्होंने ही अपने अपार धैर्य, साहस, सहिष्णुता से चुकाया।
आखिर वे फिर शहर आये। लगातार ‘ब्रांडी’ या ‘ह्विस्की’ माँगते हुए जो काफी लम्बे समय से उनकी दिनचर्या में थी ही नहीं। हम झूठ का सहारा लेते। बहाना बनाते। कि रात है, दुकानें बंद हैं। एक रात उन्होंने भारी ‘पानदान’ फेंककर मुझपर हमला किया। मैं बच गया। मैंने उन पर काफी दबाव बनाकर उन्हें लिटाना चाहा। ‘गला दबाकर मुझे मार डालना चाहते हो’ — कहकर वे निढाल लेट गये। आँखों का वह गुस्सा मैं भूल नहीं पाता हूँ।
कहाँ गयी उनकी कोमलता! मैं सोचता! आखिर गाँव में एकदम शुरू के दिनों में वे — ‘जागो मोहन प्यारे’ — बोल के साथ में भैरव राग से जगाते। वे दिन बहुत पहले छूट चुके थे। अब वे जैसे हमसे किसी तरह का बदला लेने की स्थिति में थे। मैंने उनकी उपेक्षा की थी। वे हम सबकी उपेक्षा कर रहे थे।
हम उन चीजों की याद दिलाना चाहते थे, जिनसे उनका भाव बदल सकता था। जैसे वसंत के आने पर पीले रंग की याद। हरसिंगार के फूलों की याद। अबीर-गुलाल। पर यह सब क्षण भर के लिए काम करता। फिर वही हिंस्र भाव। सबके प्रति और अपने प्रति भी। माँ की वह ‘हत्या’ थी तो इसे क्या कहेंगे — ‘आत्महनन’।
उम्र के साथ हम बहुत कुछ भूलते हैं। पर कुछ नहीं भी भूलते हैं। स्कूल के दिनों के अंग्रेजी के अध्यापक त्रिपुरारी पांडे को भूल पाना कठिन है। गांधीवादी। गांधी जी की हत्या की खबर गाँव में दूसरे दिन सुबह पहुँची तो हमने उनके बेहोश हो जाने की खबर के साथ-साथ जाना। हमारे लिए वे एक और गाँधी थे। नबीहन तक की सहन बुहारते। अभी-अभी ‘एक अनायक का वृत्तांत’ कविता उन्हीं पर लिखी गयी।
अकारण ही कुछ और घर याद आते हैं। एक घर अभी-अभी किसी कविता में याद आया — एक वह जिसके लिए खत की शैली में लिखी गयी थी — पहली कहानी। साथ-साथ घर तक जाता हूँ साँस रोककर कि उसे दे दूँगा पर दे नहीं सका। एक दिन। दो दिन और कई दिन। कागज़ हॉफपैंट में रखे-रखे सील गया। अनकहा पहला प्रेम। प्रेम के किस्से बेशुमार। पर ऐसे ही।
बस सोचता कि एक वह घर भी घर ही है जिसमें कुछ लड़कियाँ बड़ी हो रही हैं। क्या वैसे ही जैसे हम बड़े हो रहे हैं। यह बेवकूफियों से भरी शुरू की रोमैंटिक फिल्मों का भी असर था कि आप अकेले हैं — बगैर बताये प्रेम कर रहे हैं और दुखी हो रहे हैं क्योंकि आप दुखी ही हो सकते हैं। फैसला नहीं कर सकते। किसी के लिए रास्ते में घंटों खड़े रह सकते हैं पर साफ साफ कह नहीं सकते। हमारे समय में यह एकतरफा रोमांस भी खाँटी किस्म का आदर्शवाद था। ज्ञानरंजन तक की कहानियाँ पढ़कर हमें अक्सर अपना बचपन याद आता है। जबकि ज्ञानरंजन की कहानियाँ किसी देवदास की कहानियाँ नहीं हैं।
पहले साहित्य शिक्षक के रूप में याद कर सकता हूँ — किसी राजघराने से जुड़े; ठाकुर विश्वंनाथ सिंह। उन्हें कस्बे के मामूली स्कूल में नौकरी करने की जरूरत क्यों पड़ी — समझ पाना कठिन था। पहली बार एक नई भाषा उनसे सुनने को मिली। यूनिवर्सिटी से सीधे निकले होंगे। नये ढंग के कपड़े। सुकुमार व्यक्तित्व। और फिर यह नयी भाषा का जादू। पहली रचना जो उन्होंने पढ़ायी — जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘ममता’। वह हाईस्कूल के कोर्स में थी।
शहर आया और बी०ए० में अंग्रेजी साहित्य लिया तो गुरु मिले प्रोफेसर अहमद सिद्दीक मजनूँ गोरखपुरी। कॉलेज में तो हर अध्यापक को प्रोफेसर ही कहा जाता था पर मजनूँ तो प्रोफेसरों के प्रोफेसर थे। भाषाशास्त्र या लिंग्विस्टिक तक के मामले में हिन्दी के बड़े-बड़े अध्यापक उनसे घबराते कि तुलसीदास से ही किसी शब्द की व्युत्पत्ति न पूछ दें। उर्दू इलाके में उनकी आज तक वही साख कायम है जो रामविलास शर्मा जैसे आलोचक की हो सकती थी।
अंग्रेजी साहित्य के अंतर्गत वे हार्डी काटेस पढ़ाते। ‘आस्कर वाइल्ड’। कभी ‘शेक्सपियर’ भी। क्रिटिकल अप्रोच क्या होती है, मूल्यांकन का पर्सपेक्टिव क्या होता है, यह उन्हीं से जाना। वे प्रगतिशील लेखक संघ (हिन्दी-उर्दू सम्मिलित फोरम) के मार्गदर्शकों में थे। प्रसिद्ध कवि रघुपति सहाय फिराक अर्थात फिराक गोरखपुरी अक्सर उन्हीं के साथ ठहरते। उनके साथ कॉलेज भी आ जाते। किसी विषय पर व्याख्यान। या और किसी बहाने। मेरे आलोचक बनने के पीछे शायद उन्हीं का असर पहले मानना चाहिए।
नामवर सिंह ‘५५-५६’ में गोरखपुर आये शायद और पहले भी — प्रगतिशील लेखक संघ के प्रेमचंद जयंती वाले कार्यक्रम में। ‘५३-५४’ में — फिर पूर्वोत्तर रेलवे की हिन्दी समिति के निमंत्रण पर। फिर कॉलेज से विश्वविद्यालय तक के साहित्यिक आयोजनों में। उनके कई-कई व्याख्यान। साहित्य का समाजशास्त्र। विचारधारा और साहित्य। सादगी का सौन्दर्यशास्त्र। प्रेमचंद और भारतीय उपन्यास। जैसे विषय। कई-कई दिनों तक उनका असर बना रहता। उनसे निकटता का अनुभव भीतर से बहुत समृद्ध करने वाला।
एक ओर उनके लगातार विवाद में बने रहने की अपनी छवि या पहचान। दूसरी ओर दिल्ली हो या भोपाल, इलाहाबाद या बनारस, पूना या हैदराबाद, कलकत्ता और लखनऊ। उनकी अभूतपूर्व तैयारी देखने की चीज होती। जब से वे ‘आलोचना’ के संपादक हुए, उनके लिए लिखने का अर्थ था — बहुत कांशस होकर लिखना। याद आता है कि ‘शराब के बाद का सबेरा’ (रघुवीर सहाय) कविता की व्याख्या किसी लेख में देखकर तुरत उन्होंने पत्र लिखा। और एक वह समय भी आया, जब ‘आलोचना’ से हमारे मित्र आलोचक नंदकिशोर नवल अलग हुए और संपादक-सहयोग की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गयी।
इस प्रसंग में पहले मैंने यही चाहा, कि ऐसा कोई परिवर्तन न हो। आखिर हम उनके कहने से लगातार ‘आलोचना’ में लिखते रहे हैं। पर कारण जो भी रहा होगा, उसे प्रभावित करने की स्थिति में हम न थे। ‘आलोचना’ के संपादन के अनुभवों पर अलग लिख चुका हूँ। और आज ‘आलोचना’ का संपादन ही मुझे सौंपा गया है। नामवर जी प्रधान संपादक के रूप में लगातार साथ हैं। सक्रिय। एक नये उत्साह से भरे हुए और मुझे ‘श्रेय’ मिल रहा है कि आलोचना सहस्राब्दी अंक एक में, जिसकी आरंभिक परिकल्पना उन्हीं की है — उनके दो-दो निबंध मौजूद हैं। संपादकीय भी निबंध ही है और दूसरा वाद–विवाद–संवाद की रणनीति के अनुरूप — ‘कबीर को भगवा’। हम सहमत होते हैं तो असहमत भी होते हैं — यह मानकर कि आलोचना ‘असहमति’ की भी संस्कृति है।
बहुतों को आश्चर्य होता है कि ‘आलोचना’ (राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली) का संपादन मैं गोरखपुर से कर रहा हूँ जो कि वास्तविकता है। मेरी परिस्थितियों को देखकर नामवर जी और राजकमल के प्रबंध निदेशक अशोक माहेश्वरी ने मुझे ऐसी छूट दी है। यह और बात है कि जितना जरूरी है, मैं दिल्ली आता–जाता हूँ और हफ्तों रह लेता हूँ। मेरे ग्रह–नक्षत्र ऐसे ही रहे हैं कि मैं गोरखपुर छोड़ न सका। बस एक बार नामवर जी और श्रीमती निर्मला जैन के परामर्श से बर्दवान विश्वविद्यालय का प्रोफेसर–पद सँभाला और स्नातकोत्तर अध्ययन तथा अनुसंधान केन्द्र के रूप में उसे विकसित करने की कोशिश की। वहाँ के कुलपति प्रोफेसर मोहित भट्टाचार्य समझ पाने में असमर्थ थे कि तमाम सुविधाओं का प्रलोभन देने पर भी मैं गोरखपुर क्यों लौटना चाहता हूँ। इस बीच के कई वर्ष ऐसे थे कि मैं अपने ही शहर में अकेला और अपने ही विश्वविद्यालय में अजनबी था। मित्र–हितैषी सब मेरे बर्दवान रहने के फायदे गिनाते और मेरी बुद्धि पर तरस खाते। यह वह समय है जब मुझे सब ओर शत्रु–पक्ष के ही गढ़ दिखाई देते। जिन्हें मेरे यहाँ रहने–न–रहने से कुछ लेना न था, वे भी आना–पाई तक का हिसाब लगाकर बता जाते कि मैं बर्दवान ही रह जाऊँ, गोरखपुर न लौटूँ तो सीधे इतने का फायदा है। वर्ना इतने का भारी नुकसान। एक ऐसा जाल चारों ओर बुना जा चुका था कि कई बार मन आत्महत्या का शिकार होता। उधर मेरी बेटियाँ! पढ़ाई के भी आधे–अधूरे रास्ते में। मिक्की (अन्विता) मेरे जाने के साथ ही बीमार पड़ चुकी थी। ‘अपराजिता’ (बड़ी बेटी) के विवाह की चिंता थी। श्रुति (सबसे छोटी) तो अभी भी पढ़ाई के रास्ते में है। मैं पस्त बैठा हूँ और उनसे पूछ रहा हूँ — ‘तुम लोग तय करो कि मुझे क्या करना चाहिए?’ कल्याण मल लोढ़ा कहते — कलकत्ता विश्वविद्यालय तो तुम्हारे लिये खुला है। निर्णय करो और आ जाओ!’ एक समय ‘भारतीय भाषा परिषद’ को मेरे निर्णय का इंतजार था। यह स्वजनों की हिताकांक्षा ही थी — यहाँ से वहाँ तक। दूसरी ओर ‘घर’ का यानी ‘भीतर’ का विरोध था। मित्रों के पत्र मिलते। यहाँ भी वहाँ भी। कि बच्चों को देखते हुए लौटने का निर्णय सही है। यह भी कि लड़ाई में अकले नहीं हैं। लड़ाई — जो कि लम्बी है और जटिल है।
बहरहाल, लौटना था — सो लौट आया। लौटने भर के लिए एक स्वतंत्र पद (प्रोफेसर प्रेमचंद पीठ) के सृजन के लिए उत्तर प्रदेश शासन से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तक जितनी शक्ति लगानी पड़ी, वह अलग कहानी है। यह सब तो मिला, अपने ही करने से मिला। विश्वविद्यालय लगभग उदासीन पड़ा रहा। प्रेमचंद के नाम पर पीठ — यानी लगभग एक स्वतंत्र अध्ययन केन्द्र। अपने आप में संस्थान। पर जैसा हमारा शासन तंत्र है — उसने इसे एक पद–मात्र का दर्जा दिया। कुछ भी, जैसे कि एक राष्ट्रीय स्तर का परिसंवाद — आयोजित करने के लिए केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय से सहयोग लेना पड़ा। ‘पद’ की नियति यह कि प्रेमचंद से उसके जुड़े होने का कोई अर्थ नहीं। पद है, तो भरा नहीं जा रहा है। बहुतों को लगता है कि वह मेरे साथ ही खत्म हो गया। अब हमारे विश्वविद्यालयों को कोई ‘मिडिलचियों का संस्थान’ कहता है तो बुरा नहीं कहता।
लौट आने पर कभी लगता कि गलती की — एक जो दूसरी ही दुनिया में रहने का चुनौतीपूर्ण अवसर था, अपने ही कारणों से गँवा दिया। कभी अरुण कमल ने बर्दवान से भेजे पत्र के उत्तर में लिखा; “आपका पत्र मिला तो बंगाल की मसृण भूमि और मेघे ढाके गगन का चित्र घूम गया। घर की याद तो आयेगी ही। प्रकृति भी तभी सुंदर लगती है जब घर भरा हो … एक पत्र बिटिया अन्विता का आया है। आपके वहाँ न रहने पर आपकी बिटिया का पत्र पाकर मन भर आया। ‘अब संध्या और भी अपनाव का आँचल डालेगी दिवस के मुख पर’।” तीन छात्राओं और ढाई अध्यापकों का वह विभाग अब खासा भरा–पुरा है। अतिथि भवन का कमरा नम्बर ११ हिन्दी कविता के पाठकों के लिए कभी–कभी उत्सुकता का विषय है। कलकत्ता उन्हीं दिनों के अनुभव के आधार पर मेरा दूसरा घर है। एक घर प्रेम का — श्रीमती प्रेम सोन्थलिया (जो पहले प्रेमलता अग्रवाल थीं — मेरी शिष्या और सगी बहन से भी अधिक घनिष्ठ और प्रिय!) का घर — जो अब नहीं हैं — विवाह से पहले यहीं थीं। ‘अंजो दीदी’ ‘मृच्छकटिक’ आदि नाटकों में भूमिकाएँ कीं। संस्कृत में एम०ए० किया तो पं० विद्यानिवास मिश्र ने पढ़ाया और काफी स्नेह दिया। कलकत्ता जब मैं किसी बड़े आयोजन के बहाने जाता तो प्रेम तमाम लेखकों से मिलतीं और मुझ पर अपना अधिकार जताकर खुश होतीं। अलका (अलका सरावगी / कलिकथा वाया बाइपास की लेखिका) से मेरा परिचय कुछ बाद का है — फिर भी आठ दस साल की निकटता तो है ही — मिलीं विश्वविद्यालय की घनश्यामदास बिड़ला व्याख्यान–माला में मेरे तीन व्याख्यानों के आयोजन के समय और अलग मिलने के लिए स्थान जानना चाहा, जहाँ ठहरा हूँ, तो जानकर खुश कि वे तो शिक्षायतन में शिक्षिका रही हैं। अलका इस घर में आने–जाने लगीं और घंटों मुझसे साहित्य चर्चा में बराबर साथ, तो प्रेम की खुशी देखने लायक होती। उन्हें लगता कि पहले की ही तरह वे मेरी क्लास में हैं और मुझसे पढ़ रही हैं। प्रेम का परिवार मेरा ‘अपना ही परिवार’ जैसा। प्रेम नहीं है तो रचना ही मेरी देखरेख में है। उसे सब पता रहता है कि कब मुझे क्या चाहिए।
इस अर्थ में मेरी दुनिया काफी बड़ी होती गयी है। दो बेटियाँ विवाहित और परिवार में हैं — तो पूरा परिवार ही मेरे लिए मित्र जैसा है। उनके पति, बेटे सभी। और मैं उनके बीच हर पल एक नई स्फूर्ति पाता हूँ। मैं अहमदाबाद में हूँ या पुणे में या दिल्ली या कलकत्ते में — जैसे अपने ही परिवार में हूँ। मेरे अपने जीवन संघर्ष और साहित्यिक संघर्ष में इलाहाबाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। साहित्यिक आन्दोलनों का एक पूरा युग हमारे अनुभवों में इलाहाबाद के बहाने ही शामिल है। जैसे, कभी लखनऊ के दिन। जब मैं यशपाल जी का पड़ोसी था और उनके घर पर ‘लखनऊ लेखक संघ’ की बैठकों में शामिल। बहुत कुछ पीछे छूटता जाता है पर नया भी जुड़ता जाता है। दिल्ली मेरे लिए काफी परिचित हो गयी जब मैं लगातार दस साल साहित्य अकादमी का सदस्य था। साहित्य अकादमी की कितनी ही बड़ी–बड़ी योजनाओं में शामिल। दूसरी भाषाओं के लेखकों से भी निकटता बढ़ी। बिज्जी (विजयदान देथा) के साथ जितना समय इस बीच बीता होगा — वह भीतर–भीतर गहरी स्निग्धता दे गया होगा। वे गोरखपुर आये। घर–परिवार के हो गये। कहानी पढ़ रहे हैं और लोग साँस रोक कर सुन रहे हैं। क्या यहाँ! और क्या श्रीनगर में। और बिज्जी खुश। शाम उन्हीं के हवाले। पहले थोड़ा उपदेश। फिर उन्मुक्त।
पर यह सब बाद की बातें हैं। जहाँ तक मेरे शुरू के दिनों का वास्तविक जीवन–संघर्ष है, जिसमें धीरे–धीरे लेखक बनने के संघर्ष के अनुभव भी जुड़ जाते हैं, उसकी कथा काफी कुछ इलाहाबाद से जुड़ी है। कठोर सच यह कि ५३ में बी०ए० करने के बाद मैं बिना यह जाने, कि मेरा घर मेरे बाहर पढ़ने और रहने का खर्च जुटा सकेगा या नहीं, इलाहाबाद पढ़ने चला गया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम०ए० करने का संकल्प लेकर। हीवेट रोड पर वगैर किराया दिये रहने के लिए एक कमरा पिता के किसी मित्र के जरिए मिल गया था। साधन ऐसे भी न थे कि होटल में खाने का खर्च उठा पाता। स्वास्थ्य ऐसा नहीं कि पैदल हीवेट रोड से विश्वविद्यालय जा सकूँ। प्रवेश के लिए प्रयत्न कर रहा था तभी डॉ राम कुमार वर्मा से मिलने चला गया। उन्होंने साहित्यिक रूचि जानकर हिन्दी में ही एम०ए० करने के फायदे बताये और मैं हिन्दी विभाग में आ गया। धीरेन्द्र जी के अनुशासन में पढ़ने का अनुभव अलग। और यह जानकर अच्छा लगा कि अध्यापकों में धर्मवीर भारती और जगदीश गुप्त भी हैं जो एम०ए० नहीं पढ़ा रहे हैं पर विभाग में हैं। मार्कण्डेय, कमलेश्वर, दुष्यन्त या तो एम०ए० कर चुके थे या बस विश्वविद्यालय छोड़ रहे थे। शायद शोध में प्रवेश की कोशिश के साथ। हुआ यह कि मैं अपनी इस दौर की जिन्दगी में न्यूनतम जीने के साधन भी न जुटा सकने के कारण टूटता चला गया और अचानक इस तरह बीमार पड़ा कि इलाहाबाद छोड़ना पड़ा और डाक्टर की सलाह पर पढ़ाई स्थगित करनी पड़ी। ‘प्लूरिसी’ — शायद जाँच से डाक्टर इसी नतीजे पर पहुँचे थे। पंत, निराला, महादेवी जिस शहर में हों उसमें रहने का जो लेखकीय सपना था, वह बिखर गया। महादेवी जी और इलाचंद्र जोशी के साथ आने से पहले बातचीत का एक लम्बा सिलसिला बीच में ही टूट गया था। किस्सा यही, कि रहेंगे इलाहाबाद में, पर खायेंगे क्या!
आगे एम०ए० हिन्दी में करना है तो सेंट एण्ड्रयूज कॉलेज से ही कर लेंगे क्योंकि अवकाश प्राप्त सगे चाचा का घर था (जिसमें बाजार या टाल जैसी भीड़भाड़ थी पर दो वक्त की रोटी सुनिश्चित थी) और डॉ० आनंद प्रकाश दीक्षित जैसे अभिभावक तुल्य गुरु थे। पर दिमाग तो लखनऊ–इलाहाबाद में फँसा हुआ था। लखनऊ में गिरिजाकुमार माथुर का स्नेह प्राप्त था। इलाहाबाद में धर्मवीर भारती का। फिर विजयदेव नारायण साही का। डॉ रघुवंश का। प्रगतिशील लेखकों का एक अपना मोर्चा था — जिससे भैरव प्रसाद गुप्त, मार्कण्डेय के सूत्र से जुड़ा था। नामवर जी के प्रभाव में पहले से था। गोरखपुर में जब स्टूडेन्ट्स फेडरेशन में सक्रिय था, हिन्दी उर्दू प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ा था।
मार्गदर्शक थे — वही प्रोफेसर मजनूँ गोरखपुरी — जो मार्क्स, हीगल और द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पर बहस करने के साथ क्लासिकी सौन्दर्यशास्त्र वगैरह पर भी चर्चा करते। यह प्रसंग अन्यत्र भी आया है। इलाहाबाद में भी यह संभव था कि हम विभिन्न विचारधाराओं के लेखकों के संवाद जारी रख सकें।
इलाहाबाद इसलिए भी याद आता कि ‘५६-५७’ के दो बड़े राष्ट्रीय स्तर के लेखकों सम्मेलनों में हिस्सा लेने का अवसर मिला। शायद दोनों में लखनऊ के आदरणीय तथा प्रिय साथियों के साथ ही इनमें शामिल होना था। यशपाल जी दोनों सम्मेलनों में शरीक थे। हीवेट रोड पर वे मेरे पड़ोसी थे। ‘विप्लव’ कार्यालय उनका घर भी था जहाँ लखनऊ-लेखक संघ की बैठकें होतीं। याद है कि पहली बार — (वही ‘५७-५८’ का समय —) कविता पढ़ी तो टिप्पणी की — शमशेर और कुँवरनारायण जैसे कवियों ने।
पहले आयोजन के पीछे ‘परिमल’ और अज्ञेय की ताकत लगी थी और बंगला मराठी कन्नड़ असमिया के कई बड़े लेखक मौजूद थे। ताराशंकर बंद्योपाध्याय, शिवराम कारंत, वीरेन्द्र भट्टाचार्य, माबररेकर। विषय था : लेखक और राज्याश्रय। दो सत्रों में बोलना था। एक के अध्यक्ष ताराशंकर बंद्योपाध्याय; दूसरे के यशपाल। बीच में कभी मार्कण्डेय ने संकेत किया — कि गलत लोग हैं और पूछा कि यह प्रभाकर माचवे नाम का आदमी क्या कह रहा था? प्रभाकर माचवे ने भाषण के तुरंत बाद मेरा पता नोट किया था। वे ‘क्वेस्ट’ के संपादक रहे हैं।
इस सम्मेलन के तुरंत बाद प्रगतिशीलों ने सर्वदलीय सम्मेलन की तरह बहुत बड़ा साहित्यकार-सम्मेलन आयोजित किया था। यह बिखर चुके प्रगतिशील लेखक संघ की पहल थी — ‘सहचिन्तन’ को बड़ा मुद्दा बनाकर। शायद ऐसा यह पहला और अंतिम सम्मेलन रहा होगा जिसमें कई पीढ़ियों के सक्रिय लेखक शामिल थे। अमृतराय, नामवर सिंह, मार्कण्डेय, कमलेश्वर इसके पीछे थे — लगभग कार्यकर्ता की तरह। अलग अलग विधाओं पर एक साथ गोष्ठियाँ क्योंकि इसके वगैर इतने लोगों की सहभागिता असंभव थी।
जहाँ तक याद है नामवर सिंह कहानी गोष्ठी से कविता गोष्ठी में, कविता गोष्ठी से कहानी गोष्ठी में आते-जाते रहे। घमासान तो कहानी गोष्ठी में ही। नयी कहानी के शुरू के दिन। कविता गोष्ठी में अध्यक्ष थे कवि सुमित्रानंदन पंत। पर्चे चार पढ़े गये थे। मुक्तिबोध, नरेश मेहता, केदारनाथ सिंह के पर्चों के साथ मेरा पर्चा — कविता में लय। मुक्तिबोध का ‘काव्य की रचना प्रक्रिया’ पर डेढ़ पेज का निबंध सब पर भारी था। यह मेरी मुक्तिबोध, रेणु से पहली भेंट थी। यहाँ से लौटकर दिमाग पर जो नशा-सा छाया था वह एक जीवन के लिए काफी स्फूर्तिप्रद। अब मुझे लेखक ही होना था। इससे अलग जीवन की कल्पना असंभव थी।
यह उदाहरण है कि शुरू के दिनों का प्रेम — चाहे वह साहित्य के लिए ही क्यों न हो — और किसी काम का रहने नहीं देता। इलाहाबाद तो पूर्णकालिक लेखकों का शहर रहा है। बहुत हुआ तो लेखकों ने प्रकाशन शुरू कर दिया। अपनी पत्रिकाएँ निकालने लगे। इमरजेंसी के आसपास का, बल्कि ठीक पहले का लेखक सम्मेलन अभूतपूर्व था। हिन्दुस्तानी एकेडमी सब तरह के साहित्य विमर्श का एकमात्र केन्द्र। यहाँ तक कि विश्वविद्यालय तक की साहित्य संगोष्ठियाँ हिन्दुस्तानी एकेडेमी में होतीं। प्रेमचंद जन्मशती जैसे बड़े आयोजन। यह सब एक जीवंत आलोचनात्मक संस्कृति के अनुरूप।
इलाहाबाद में ही पिछले दिनों ऐसे युवा कवि लेखक हुए जिनसे लम्बी-लम्बी बातचीत होती रही है। बद्रीनारायण, बोधिसत्व, हरिश्चंद्र पांडे। इलाहाबाद ने मुझे जिस तरह का मान और स्नेह दिया वह अविस्मरणीय है।
मेरी दो बेटियाँ इसी शहर में। अन्विता के विवाह की बात ही चली तब जब मैं हिन्दुस्तानी एकेडेमी के निमंत्रण पर प्रेमचंद स्मृति-व्याख्यान माला के अंतर्गत ‘प्रेमचंद : विचारधारा और साहित्य’ विषय पर दूसरा व्याख्यान देने आया। और इलाहाबाद में इस शुभ-संयोग के साक्षी थे — मार्कण्डेय, नीलाभ, नीलकांत, सत्यप्रकाश मिश्र, दूधनाथ सिंह, सतीश जमाली और अनेक अग्रज तथा युवा साथी। सुख दुख से सीधे जुड़े जैसे मित्र इलाहाबाद में मिले, और कहीं शायद ही मिलें।
वे अक्सर कहते हैं कि अब तो मुझे इलाहाबाद में ही ‘घर’ बनाकर रह लेना चाहिए। शायद उसकी जरूरत भी नहीं क्योंकि बड़ी बेटी अपराजिता का घर ही वहाँ मेरा स्थायी ठिकाना है। रामस्वरूप चतुर्वेदी हर नयी किताब के बारे में उत्सुक। मार्कण्डेय की पत्रिका ‘कथा’ से ऐसा सम्बन्ध जैसे वह अपनी ही पत्रिका हो। उसके लिए सब कहते हैं — देर आयद दुरुस्त आयद! यह इलाहाबाद की संस्कृति है कि गालिब पर विमर्श के लिए शमसुर्रहमान फारुकी के साथ हिन्दी के कई लेखक साथ हों और लगे कि गालिब निराला जितने हमारे हैं उतने ही उनके।
लखनऊ याद आता है तो आज के ‘कथाक्रम’ के आयोजनों से जुड़कर। लखनऊ में अब पहले का-सा सन्नाटा नहीं है। अखिलेश का ‘तद्भव’ और शैलेन्द्र सागर का ‘कथाक्रम’। मुद्राराक्षस, वीरेन्द्र यादव, राकेश, नरेश सक्सेना, लीलाधर जगूड़ी जैसे साथियों के बगैर लखनऊ की सक्रियता अकल्पनीय है। और सबसे अलग श्रीलाल जी के साथ कुछ शामें। कुछ दुपहरें भी। किसी समय अधिकांश सुबहें कुँवरनारायण जी के साथ।
अब तक न याद आया हो तो याद आना चाहिए — ‘युग चेतना’ में छपा पहला आलोचनात्मक निबंध! जिस पर ‘कल्पना’ के बद्रीविशाल पित्ती का ऐसा उत्साह कि प्रायः ‘कल्पना’ में आलोचना लिखने लगा। याद है वह एक टिप्पणी ‘समय का तर्क और नयी कहानी’ — जिसे घेर कर संपादक ने लिखा : “कुँवरनारायण की परिन्दे और जिन्दगी और गुलाब के फूल की समीक्षाएँ और परमानंद श्रीवास्तव की टिप्पणी मिलकर गोष्ठी का-सा आनंद देती हैं। आमंत्रित है पाठकों की प्रतिक्रियाएँ।” ये थे शुरू के दिन। शुरू का उत्साह और नशा। यह सब एक लम्बी कहानी है। ठाकुर प्रसाद सिंह नहीं रहे। राजेश ने आत्महत्या कर ली। पर लखनऊ तो है और उतना ही हर क्षण स्मरणों में सजीव। बहुत कुछ ऐसा जिसे कहने का समय अभी नहीं आया है।
केदारनाथ सिंह के साथ मेरी मित्रता मेरे जीवन का एक बड़ा हिस्सा है। ‘५५-५६’ से अब तक। अभी उदयप्रकाश ने ‘वर्तमान साहित्य’ के शताब्दी अंक में ‘बाघ’ पर लिखते हुए पड़रौना के उनके समय को जो निस्तब्धता का समय कह दिया है वह आधा ही सच है। उस काल-खंड के केदार पर लिखा नहीं गया — यह भी अधूरा सच है।
कविता की आलोचना की मेरी पहली किताब ‘नयी कविता का परिप्रेक्ष्य’ जिसे नीलाभ ने शायद १९६४-६५ में बहुत आग्रह और रुचि से छापा था, आज उसका सिर्फ पुनर्मुद्रण हो जाय तो उस अंधकार-काल को हम अचानक एक नई रोशनी की तरह देखने लगेंगे। वह पुस्तक ‘नयी कविता’ के बहाने ‘केदार’ पर अधिक केन्द्रित जान पड़ेगी। लगभग आधा हिस्सा उन टुकड़ों को जोड़ता हुआ दिखेगा जो केदारनाथ सिंह की पूरी और मुकम्मल ही नहीं आधी अधूरी कविताओं से भी चुन लिये गये हैं।
कृष्णनारायण कक्कड़ ने आलोचना करते हुए लिखा था जो कविताएँ सम्पूर्ण रूप में छपी भी नहीं हैं उनका ऐसा इस्तेमाल अनैतिक है। लक्ष्मीकांत वर्मा ने उस पर लिखते हुए अधिक सूक्ष्मताओं से उलझने की प्रवृत्ति पर टिप्पणी की थी। सर्वेश्वर ने खिन्न मन से लगभग इस मूल्यांकन को खारिज किया था। इनमें से कुछ लेख विकसित रूप में आगे ‘आलोचना’ में छपे भी।
केदार के लिए किसी भी अर्थ में यह निस्तब्धता का काल न था। बस वे कविताएँ प्रायः छिपाकर रखते। सुनाते, तो यही कह कर कि अभी फाइनल नहीं हैं। धीरे-धीरे मैं ही ‘आलोचक’ की भूमिका में उनका पहला ‘पाठक’ भी था। उनकी तमाम कविताएँ पहली बार मेरे ही सामने पढ़ी गयी हैं। ‘बाघ’ तक के बारे में शायद मुझसे पहले किसी को खबर न थी। कविता का एक हिस्सा तुरंत ही मैंने चुन लिया और एक सुबह नामवर जी को बताया — कि यह हम दे रहे हैं। केदार अपनी कविताओं के खुद भी सख्त आलोचक हैं। वे अंतिम पाठ तक काट-छाँट करते रहते हैं। इसमें तनिक भी ढीलापन वे नहीं बरतते। अब कहा तो यह भी जाने लगा है कि उनकी सब कविताएँ अच्छी ही अच्छी क्यों हैं!
अपने गुरुओं में से एक आनंद प्रकाश दीक्षित के बारे में अब तक मैंने कुछ नहीं कहा है। मुझे डर लगता है। क्या कहूँ! क्या नहीं! रहने के लिए साल भर उनके ही आश्रय और अनुशासन में उनके घर में रहा। साथ रोटियाँ खायीं। साहित्यिक सवालों को लेकर — जैसे कि रस-सिद्धांत बनाम नई कविता — काफी लड़े-झगड़े। फिर सब सामान्य। और एक दिन जब एक तरह का तनाव लिए उनके यहाँ से चला तो चुप-चुप निकल जाना ही संभव था।
साहित्यिक बहसें इस हद तक विक्षुब्ध और उत्तेजित कर सकती हैं यह तो अब कल्पना से भी परे है — क्योंकि बहस में अपने पक्ष को लेकर न वह प्रतिबद्धता रही, न उन्हें गंभीरता से लेने या आगे बढ़ाने का धीरज। नैतिकता का बंधन उनका काफी कड़ा था। वह भी बहस की सहजता के आड़े आता था।
बरसों बाद वे कहीं — शायद कोचीन में मिले — तो चकित थे, कि मैं “नई कविता” की खामियाँ बता रहा था और वे ‘रस सिद्धांत’ को आज के संदर्भ में अपर्याप्त, बल्कि अप्रासंगिक ठहरा रहे थे। किसी भी तरह के शास्त्रवादी आतंक के विरुद्ध मोर्चा बनाने वालों में उन दिनों साथ थे — भगवान सिंह, रामसेवक श्रीवास्तव और देवेन्द्र कुमार। ‘रचना’, ‘सम्प्रति’ उन्हीं शुरू के दिनों की पत्रिकाएँ — जिनमें मुक्तिबोध तक ने लिखा। देवेन्द्र कुमार का न होना इधर की हमारी सबसे बड़ी क्षति है। उन दिनों के बारे में फिर कभी।
उस शाम उर्दू के प्रख्यात कवि रघुपति सहाय फिराक की अपनी आवाज एक शांत स्तब्ध सभागार में गूंज रही थी। एक अलग अंदाज! अलग-सी खनक कुछ ही पलों के बाद उनकी खास चुनी गई दसेक गजलें अलग-अलग गायकों–गायिकाओं के अपने अंदाज में गाई जाने वाली थीं। प्रदर्शनकारी कलाओं ने हमारे कठिन और विसंगतियों से भरे समय में अपने दर्शक वर्ग को संबोधित करने के अपने ढंग निकाल लिए हैं। कुछ ऐसा कर लिया है कि उन्हें एक खास समयावधि में उनकी अपनी शर्तों पर सुन लिया जाए। रंजकता (यानी एक तरह की खुशी में बह जाना या खो जाना) उनकी शर्तों में प्रमुख होती है। पर फिराक और फैज जैसे शायर हैं कि इस डूब जाने या डुबा लेने जैसे अंदाज पर अलग तरह का दबाव डालते रहते हैं। दिल के साथ ही दिमाग में वे बजने लगते हैं। आवाज जहां वातावरण में एक कंपन पैदा करती है, वहीं एक नए तरह के तनाव से भी परिचित कराती है। कविता के स्थापत्य में लय और संगीत का रचाव तो है, पर वह तनाव भी है जो बड़ी कविता का, महान कविता का गुण है।
यह फिराक की स्मृति की शाम थी और मुझे कई साल पहले का फिराक का काव्यपाठ याद आ रहा था। उनकी ‘बतकही’ याद आ रही थी। भाषा, संस्कृति और समय को लेकर अलग-अलग समय पर की गई उनकी टिप्पणियां याद आ रही थीं। १९२८ का उनका लेख याद आ रहा था– ‘महान कविता क्या है!’ जिसे आलोचना–८१ में हमने प्रकाशित किया था। आश्चर्य है, छंद की वापसी या कविता में संगीत के पुनर्वास पर हर रोज बल देने वालों ने फिराक की बहुत महत्वपूर्ण स्थापनाओं पर कभी विचार नहीं किया। भूलना इस युग का स्वभाव है, लाचारी भी। पर अक्सर हम ‘उसे’ भूलते हैं जो असुविधाजनक है, अटपटा है, मुश्किल में डालने वाला है। फिराक अपने विश्लेषण में ‘तनाव’ और ‘नमनीयता’, ‘तनाव’ और ‘संगीत’ का जिक्र एक साथ कर रहे थे। हमारे समय की कविता के लिए सबक है– उनके कई-कई विचार सूत्र। ‘गहरी शांति’ की जरूरत। ‘तनाव’ को निर्वासित करके, विचार या चिंता को उपेक्षित छोड़कर नहीं की गई है। इसलिए फिराक आज याद आ रहे थे। इसी अर्थ में कहा जाता है कि महत्वपूर्ण कवि या लेखक हर दौर में अपनी चिंता के साथ पढ़े जाते हैं। एक पूरा सभागार फिराक की कविता को प्रस्तुतियों के सम्मोहक अंदाज में सुन रहा था जबकि मैं उनके शब्दों की गूंज को विचारपूर्ण हस्तक्षेप की तरह अपने समय में उपस्थित देख रहा था। यह हमारा समय था फिराक के अपने समय में जिसका आना–जाना हम देख और सुन सकते थे।
यहां डर भी है और उसी में छिपी उम्मीद की चमक भी।
अभी एक दिन एक युवा समीक्षक मुझसे बचपन के बारे में, स्मृतियों के बारे में, कविता के कुछ खास शब्दों–अभिप्रायों के बारे में कई तरह के सवाल पूछ रहे थे। सब मिलाकर देखें तो रचना-प्रक्रिया के बारे में। संयोग यह कि उससे ठीक एक दिन पहले मुझे एक पारिवारिक बुजुर्ग मिले। लगातार याद दिलाते रहे कि हमारी एक ही जड़ें हैं। गांव का अतीत। अतीत का राग। जगहें जिनकी याद धुंधली पड़ने लगी है पर जो कभी अचानक स्वप्न में उतर कर मन को तीखी चमक से भर देती हैं। ‘चंदनघाट’ की याद होगी ? वे मुझसे उत्सुकतावश पूछ रहे थे। उर्दू में लिखे एक इतिहास के पन्ने उनकी स्मृति में थे। जनश्रुतियां, किंवदंतियां थीं। किले में चुन दी गई कुंवारी लड़कियों की रोमांचक दास्तान। यह दूसरी बार हुआ कि किसी ने ‘चंदनघाट’ की स्मृति–प्रसंग छेड़ दिया। मुझे उसकी कुछ भी याद नहीं। रामलीलाएं याद हैं। होली के रंग पर्व की बेफिक्र घुमक्कड़ी, बारह–बारह घंटों की पांच–पांच गांवों की परिक्रमाएं याद हैं। याद है कि किस तरह दिन भर गाया जाने वाला ‘फाग’ शाम होते ही ‘चैता’ की धुन में बदल जाता था। याद है कि लगभग उजड़ कर जब परिवार कस्बे में आ बसा था तो ‘बैलगाड़ी’ से भर कर जो सामान आया था उनमें सबसे वजनदार था– नाटक के पर्दों का गट्ठर। ‘चंदनघाट’ की कुछ याद न थी, न है। पर एक आत्मीय ने जब मुझसे पहली बार ‘चंदनघाट’ का बयान किया तो मुझे पहली बार लगा, क्या होती है जड़ों से विच्छिन्नता! यह भी जान सका कि कैसे जड़ों का राग या रस कसैली आत्मा में प्रवेश कर जाता है। स्मृतियों में अज्ञात छवियां पुनर्जीवित होने लगती हैं। मुझे रचना प्रक्रिया पर वक्तव्य देना हो तो मैं सिर्फ इस कविता की आखिरी पंक्तियों की ओर इशारा करूं।
कहानियां चंदनघाट की, दूसरों से सुनी हैं पर जानकर और अधिक जानने के लिए बेचैन सिर्फ मैं हुआ हूं। कविता यही तो करती है– और अधिक जानने के लिए बेचैन। यथार्थ और आश्चर्य दोनों कविता के लिए जरूरी है! यह आश्चर्य कोई दिव्य अलौकिक आश्चर्य नहीं, कल्पना ही है जो यथार्थ के भीतर से स्फूर्त होती है और नई विश्वसनीयता प्राप्त कर लेती है। ‘चंदनघाट’ यथार्थ भी है, यथार्थ का अतिक्रमण भी। भ्रम में होंगे जो इसे पलायन कहेंगे। रचनाप्रक्रिया के बारे में दोटूक वक्तव्य असंभव है।
अब तक के मेरे लिखे हुए का हिसाब–किताब करते हुए, अक्सर कहा जा रहा है कि मेरी रचनात्मकता का एक प्रमुख अभिप्राय है– यात्रा। ‘साबरमती एक्सप्रेस में सितार सुनकर’, ‘पहाड़ का सफर’, ‘पूना में रात’ जैसी कविताएं और कहती भी क्या हैं। ‘जूनागढ़–गिरनार’ जैसी कविताएं। स्मृति में खिंच आता है– समय, जो ‘ऐतिहासिक’ होने की अर्थवत्ता के साथ तात्कालिक भी है। वह एक अलग समय था जब बर्दवान विश्वविद्यालय के अतिथि भवन के कमरा नंबर ग्यारह में साल भर तक अपना पता–ठिकाना था। अतिथि भवन के वीरान विशाल खंड में अकेलेपन की असंख्य यादें संचित हैं। पर वहीं अकेलेपन की काट भी संभव हुई। याद आता है कि उस दिन सुबह अचानक भूकंप का–सा झटका लगा। दरवाजा खोलकर निकला तो दूर–दूर तक कोई साथ न था। यह डर एकदम स्तब्ध कर देने वाला था। तभी पास के महिला छात्रावासों से, घरों से शंखध्वनि सुनाई पड़ने लगी। मंगलध्वनि जैसी नहीं। लगा कि समूह में लोग चीख रहे हों और यह चीख एक दूसरे का बल हो। अब अकेला न था। जैसे उसी चीख में मेरा स्वर भी जा मिला था। वे सभी चीखते हुए अपने सगे, आत्मीय लग रहे थे– एक–दूसरे को भरोसा देते हुए। दिन में कोई लड़की साइकिल चलाती हुई दिखी– मैंने अपनी बेटी को याद करते हुए कहा– हां– हां, श्रुति जैसी ही तो है यह।
उसी दिन दूधनाथ सिंह का खत मिला था– ‘हम धरबारी लोग हैं– बने चाहे जितना– बच्चों से अलग और दूर नहीं रह सकते। और तुम तो हमसे बहुत ज्यादा घरबारी किस्म के आदमी हो।.... तैयारी करो और मनाओ कि वापस लौटने की योजना सफल हो जाए। हम तो यही चाहते हैं।…वैसे सुघड़ दांपत्य और वैसी मछलीनुमा तैरती बच्चियों वाले घर से दूर रहने की कल्पना ही कैसी की जा सकती है।’ हौसला बढ़ाने के लिए यह भी ‘अपनी हस्ती से हो जो कुछ हो!’ … पर इसका क्या अर्थ है कि जब घर आ गया हूं मन बार–बार वहीं, या उन्हीं जैसी सुदूर जगहों में जाना चाहता है। स्मृति में रह–रह कर उभर आता है– कमरा नंबर ग्यारह के सामने का विशाल पोखर। जलपक्षी तैरता हुआ। खिंचती जाती है– एक सीधी लकीर।
… उजली और दीप्त। उस ‘चुप्पी’ को सुनना भी निरर्थक न था।
सुंदरनगर। रंजना का घर। शमशेर जी के साथ अगली सुबह समुद्र दर्शन के लिए निकलना था। हम बंधुवर भोलाभाई पटेल का इंतजार कर रहे थे। शाम थी। और छत पर शमशेर जी के साथ देर तक अकेला मैं। वे स्मृतिगाथा ही कहने बैठे थे। कभी इलाहाबाद। कभी सारनाथ। कभी दिल्ली। बीच–बीच में चुप हो जाते। सोचता हूं कि क्यों अक्सर वे घूम फिर कर सारनाथ का ही कोई अनुभव सुनाने लगते। असंबद्ध–सा स्मरण प्रसंग। पर कहीं भीतर की सुलगती हुई शांति के बीच ‘सारनाथ की एक शाम’ कविता ‘त्रिलोचन के लिए’ है पर त्रिलोचन कविता में कहीं नहीं हैं। कोई प्रच्छन्न विकलता है जिसे नाम देना शायद संभव नहीं।
शमशेर को सुनते हुए कभी इस पंक्ति का अर्थ खुलता है– ‘वह कोलाहल जो कोंपलों से भरा है!’ ‘सारनाथ की शाम’ में।
क्या है शमशेर में इस गहरी ऐंद्रिकता से अलग और साथ–साथ जो उन्हें कालजयी बनाता है!
केदारनाथ सिंह की आरम्भिक पहचान ‘नयी कविता’ वाले दौर के एक प्रमुख गीतिधर्मी बिम्बवादी कवि के रूप में बनी थी। सूक्ष्म स्तर पर इस पहचान की विशिष्टता को बचाते हुए भी केदारनाथ सिंह ने एक नये काव्यात्मक यथार्थवाद की दिशा में अपनी कविता को विकसित तथा समृद्ध करने के लिए ज़रूरी संघर्ष किया है। केदारनाथ सिंह की कविता आत्मतुष्ट स्वभाव की उपज नहीं है—वह अनिवार्यतः एक लम्बे संघर्ष का परिणाम है। केदार के लिए कविता एक लम्बी प्रक्रिया है, चीज़ों को वस्तुपरक और जटिल तथा दूरगामी संभावनाओं तक जांचने की एक सम्यक् विधि है—वह किसी तात्कालिक उद्वेग की स्वतः स्फूर्त अनायास अभिव्यक्ति नहीं है। यह वह कविता है जो निरे रोमाण्टिक आवेग से संभव नहीं होती—न केवल बौद्धिक चिन्ता या संघर्ष के स्तर पर घटित होती है। केदारनाथ सिंह की कविताएं आज की वास्तविक स्थिति के कठोर साक्षात् की कविताएं हैं—इसी दिशा में वे काव्य प्रक्रिया की जटिलता को और उसके पीछे कार्यरत रचनात्मक संघर्ष को प्रमाणित करती हैं।
कुछ यों ही नहीं है कि मुक्तिबोध के ‘शब्दों के अर्थ में’, ‘जन जन के चेहरे जगमगाते हैं’ या मुक्तिबोध का काव्यनायक अर्थात् जीवन का वैज्ञानिक यशस्वी कार्यकर्ता ‘जनता के जीवन के संवेदनसत्यों के चित्रों से, तथ्यों के विश्लेषण-संश्लेषण-बिम्बों से’ धरित्री का मानचित्र बनाता है और क्षितिज-फलक पर टांग देता है। इस जन-पक्षधरता के पीछे मुक्तिबोध की ऐतिहासिक चेतना है, ख़ास विचारधारा और जीवनदृष्टि है। विचारधारा के साथ मुक्तिबोध की जब-तब की अनबन का भी अर्थ विचारधारा का विरोध नहीं, उससे और भी गहरी सम्पृक्ति है। यह ‘अनबन’ कभी-कभी रचना-प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।
नयी कविता में रागदीप्त बौद्धिकता का वह स्वरूप भी उभरा जो कविता में नयी ‘क्लासिकी’ उदात्तता के लिए जब-तब जगह बनाता है। नयी कविता रोमांटिक नवोत्थान की बिम्बधर्मी कविता के रूप में महत्वपूर्ण समझी गयी पर साथ ही उसमें विकास करने वाले कवि वे हुए जो सूक्ष्म काल्पनिक अमूर्त सौन्दर्य बिम्बों से सन्तुष्ट न होकर आधुनिक जीवन के विलक्षण द्वन्द्व या तनाव को बड़े काव्यफलक पर अभिव्यक्त करने के आकांक्षी थे।
कविता के सामने आज कविता से भी बड़ी चुनौतियाँ हैं, यह जानकर भी इधर के कवियों ने ज़रूरी समझा है कि कविता की बनावट या संगठन को यथेष्ट महत्त्व दिया जाय। प्रतिबद्ध कविता का भी अपना सौन्दर्यशास्त्र हो सकता है—इस मान्यता के साथ वे आधुनिकतावाद या आधुनिक कलावाद पर यह ज़िम्मेदारी छोड़कर मुक्त नहीं होना चाहते कि नये यथार्थदर्शन के अनुरूप कलाविवेक की युक्तियाँ वे निर्धारित करें।
आज की महत्त्वपूर्ण कविता के ख़ास राजनीतिक अर्थ हो सकते हैं पर आज की कविता राजनीतिक यथार्थ को काव्यात्मक यथार्थ में बदलने की प्रक्रिया और ज़रूरत के बारे में पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक है।
शमशेर के यहाँ जीवनानुभूति से कम बल कलात्मक अनुभूति पर नहीं, पर कलात्मक अनुभूति भी अपने में एक अन्तर्जीवन छिपाये रहती है। यह ज़रूर है कि शमशेर की कविता एक आत्मीय स्वर का, आत्मीय स्वर के प्रति सम्बोधन जान पड़ती है। इसी अर्थ में वह कई बार स्वयमालाप प्रतीत होती है पर यह शमशेर के काव्यविधान की विशिष्टता के कारण भी है।
शमशेर के यहाँ प्रेम की पीड़ा भी नयी मनुष्यता-अर्जित करने की विकलता का रूप ले लेती है
कविता में नये यथार्थ को प्रकट करने के लिए जिस तनावगुण का सहारा लिया वह केवल काव्यात्मक हिकमत नहीं, आज के भयावह अमानवीकरण के विरुद्ध एक प्रकार का हस्तक्षेप है।
केदारनाथ सिंह की दृष्टि में कविता नैतिक दबाव की उपज है, इसलिए शुद्ध कविता की बात बेमानी है। दुनिया को बदलना दुनिया को सुन्दर बनाने का ही दूसरा नाम है। कविता इसी गहरे अर्थ में दुनिया को बदलती है।
प्रतिबद्ध युवा कविता का जो मुहावरा धूमिल के यहाँ अप्रत्याशित तीखेपन और ताज़गी के साथ बन रहा था, उसे कुछेक कवियों की पहचान बनने के बाद ही स्वनिर्मित रूढ़ियों में सीमित होते हुए देखा गया। इधर के युवा कवियों ने राजनीतिक प्रतिबद्धता के बावजूद कविता को मानवीय आत्मीयता और रागात्मक समृद्धि देने की कोशिश की है और परिवेश के वास्तवबोध के साथ कविता में अपने खोये हुए बचपन, दबी हुई स्मृतियों, अटपटे स्वप्नों, जैविक और प्राकृतिक आसक्तियों को पुनः उपलब्ध करने और रचने की व्यग्रता प्रमाणित की है। मंगलेश-जैसे कवि की प्रकृति, क्षमता और सीमा को समझने के लिए विष्णु खरे और गिरधर राठी-जैसे कवियों को ध्यान में रखना उपयोगी हो सकता है, जो विचारसम्पन्नता के भीतर कविता को एक क्लासिकी आधार और मूल्यदृष्टि भी देना चाहते हैं।
आधुनिक कहानी यथार्थबोध की जटिलता की अधिकतम समस्याओं से निरंतर अनुप्राणित है और उसके अनुसार कहानी के कलात्मक विधान में पर्याप्त गतिशीलता भी दिखायी देती है पर कहानी को यथार्थ के अति बौद्धिकीकरण से बचना चाहिए क्योंकि वह रसग्राहिता में बाधक हो सकता है।
प्रिय भाई,
आपका 5-6-1989 का पत्र मिला।
आपके साथ अब तक न्याय नहीं हुआ, फिर भी आपने आंतरिक क्षोभ को दबाकर निरंतर कार्य किया है। यह आज के तथाकथित विशेषज्ञ (विशेष अज्ञ) यदि न समझें तो यही मानना होगा कि ‘कालोऽतिदुरतिक्रमः’। इन लोगों के बाहर आप अपनी रचनाओं के द्वारा जाने जाते हैं और जाने जाते रहेंगे। विशेषज्ञ अपनी विशेषज्ञता के दंभ में बिला जायेंगे। आप साहित्य में इसी प्रकार निरंतर सक्रिय रहें, यह मेरी आंतरिक अभिलाषा है।
आपकी पुस्तक ‘समकालीन कविता का यथार्थ’ जो हरियाणा साहित्य अकादमी, चंडीगढ़ से छपी है, आपने मुझे समर्पित करके मान और स्नेह दिया है। कृतज्ञ हूँ।
‘शब्द और मनुष्य’ मुझे अभी तक नहीं मिली है। उसे भिजवाने के लिए आप जो कर सकते हों, करें।
‘समकालीन कविता का यथार्थ’ नये कवियों और उनकी कविता पर गंभीर विचार देती है और कवियों की निजी विशेषता पर आपने ध्यान दिया है। यह एक सुखद सत्य है। इस पुस्तक पर और विचार फिर कभी लिखूँगा।
मैं दिल्ली 25 जून को पहुँच रहा हूँ। मैं मंगल तक जे. एन. यू. जाऊँगा, यानी 27 जून को। यदि आप उस समय दिल्ली में रहे तो मुलाकात हो जायगी।
पूरे परिवार सहित आपको मेरे हार्दिक आशीर्वाद।
प्रिय परमानन्द जी,
आलोचना-77 छपकर जिल्दसाज़ के पास पड़ी है और जिल्दसाज़ का घर कर्फ़्यूग्रस्त इलाके में है। मोहन जी कोशिश कर रहे हैं। अब तो आप यहीं आने पर ही अंक देख पाएँगे। इस बीच डाक से आपके पास भेजा भी गया तो पहुँचने से पहले आप चल चुके होंगे।
78वें अंक के लिए लेखों की चिंता न करें। मेरे पास लेख हैं। आपके पास जो भी सामग्री हो, ले आइए।
श्रीकांत जी की डायरी के कुछ बहुत अच्छे अंश, अप्रकाशित कविताएँ, वीणाजी (पत्नी) का एक संस्मरण — यह सब मैंने प्राप्त कर लिया है। उनके पास श्रीकांत जी पर कुछ दिन पहले यहीं मुलाकात हुई थी। कुँवरनारायण जी से कुछ अधूरा-सा लिखा रखा है। मेरा अनुरोध स्वीकार कर उन्होंने ‘आलोचना’ के लिए देने का वादा किया था। क्या आप उनसे यह लेख किसी तरह प्राप्त कर सकते हैं? अब शायद वे लखनऊ वापस चले गए होंगे। चिंता है, ‘मगध’ की समीक्षा की। इस बीच आप इसकी व्यवस्था कर दें तो अच्छा हो। दिल्ली में इस काम के लिए कोई तैयार नहीं हो रहा है।
‘आलोचना’ का यह अंक आप के आते ही प्रेस में देना है।
बाकी बातें मिलने पर।
प्रिय भाई,
आपका पत्र कल लंबी यात्रा के बाद लौटने पर मिला। लगभग 15 दिन बाद और सारा प्रयत्न करने का वक्त समय ने खा लिया। मुझे बाबा का पता था सतना का। फिर वे सीधी गये और अब विदिशा में हैं। 5 तक लखनऊ पहुँच जाएँगे। मुझे बहुत अफसोस है कि कुछ नहीं किया जा सका।
आपके बारे में और एक प्रकार से हम सबके लिए अच्छा समाचार काफी पहले मिल गया था। दिल्ली में मंगलेश अपनी तीन बेहतरीन कविताएँ आपके लिए लिखकर राजकमल में देकर आये थे। यह अच्छा लगा कि ‘आलोचना’ का एक अंक लखनऊ में जारी होगा। अब हमें विश्वास है कि ‘आलोचना’ अपने नये गौरव बनाएगी। आपको शायद पता न हो क्योंकि मैं बहुत ज्यादा नये लोगों में घूमता-फिरता हूँ कि आपके बारे में लोगों का उत्साह और विश्वास बहुत ज्यादा है इस समय। इधर आपकी रचनाओं के कारण भी यह हुआ है। आप शिखर पर आ रहे हैं। यह सब मैं बहुत खुशी में लिख रहा हूँ।
‘पहल’ का नया अंक निकल गया है। बाहर रहने के कारण आपको या किसी को भेज न सका। अब कल से होली के बाद डिस्पैच करना शुरू करेंगे। आपकी कविताएँ हैं। बाबा की भी हैं।
आप स्वस्थ होंगे। शेष मिलने पर,
प्रिय भाई,
उस दिन गोरखपुर छोड़ते समय तुमसे भेंट न हो सकी, न ही इतना इत्मीनान का समय मिला कि कुछ देर बैठकर तुमसे कुछ सुख-दुख की चर्चा हो सके। बहरहाल तुम्हारा आयोजन कुल मिलाकर सफल रहा, ऐसा ‘इम्प्रेशन’ लेकर मैं लौटा हूँ। जाहिर है, यह अकेले दम का जलूस था और इसके लिए मेरी बधाई स्वीकार करो।
यहाँ लौटकर आया तो तुम्हारी पुस्तक — ‘समकालीन कविता का व्याकरण’ की प्रति पड़ी मिली। तुम्हारा प्रकाशक दे गया था। पढ़ गया और तुम्हारी आलोचना में जो एक नई निर्णायक धार पैदा हुई है, उससे प्रभावित हुआ। नामवर जी की प्रतिक्रिया भी अच्छी है। उस दिन वे दिल्ली दूरदर्शन से जब सन् ’80 की साहित्यिक उपलब्धियों का लेखा-जोखा प्रस्तुत कर रहे थे तो उन्होंने तुम्हारी पुस्तक का खासतौर से उल्लेख किया। तुमने अपनी आलोचनात्मक भाषा को जो नई चमक और प्रखरता दी है, उसकी मैं ख़ासतौर से दाद देना चाहूँगा। मेरी कविताओं में ‘माँझी का पुल’ तुम्हारी अपनी खोज है और मेरा ख्याल है कि तुम्हारी असरदार व्याख्या को पढ़कर ही नामवर जी ने उस दिन (दूरदर्शन पर) उस कविता के महत्व पर जोर दिया। क्या तुम उस कविता की एक समग्र व्याख्या लिखना चाहोगे? तुमने अपने पिछले पत्र में यह ठीक ही लक्ष्य किया था कि मेरी इधर की कविताओं का विकास उसी दिशा में हो रहा है। इधर लिखने का एक प्रवाह आया है — देखो क्या कुछ बनता है। दिल्ली आजकल उत्सवों से भरी है — फिल्मोत्सव और नाट्योत्सव और न जाने क्या-क्या! अपना मन उत्सवों से घबराता है — हालाँकि दो-एक अच्छी फिल्में देखना चाहता हूँ। श्री कुँवर नारायण तो हफ्तों से सीजन टिकट लेकर डेरा डाले बैठे हैं दिल्ली में। कभी-कभी लगता है कि आदमी के पास कम से कम उतनी सुविधाएँ तो होनी ही चाहिए — जीने के लिए — जितनी कुँवर के पास हैं। पर शायद सुविधाएँ आदमी की — खासतौर से रचनाकार की — बुनियादी बेचैनी छीन लेती हैं — यही गड़बड़ है। मैं जानता हूँ, तुम भी गोरखपुर में बहुत संतुष्ट नहीं हो। पर एक बात कहूँगा — इस सारे ‘असंतोष’ को एक लेखक की हैसियत से अपना दुर्भाग्य कभी मत समझना! तुम्हारी आलोचना में इधर जो धार पैदा हुई है, उसका इससे सीधा संबंध है। तुम जानते हो, मैं बेतरह अकेला हो गया हूँ — सिर्फ उसको बाहर प्रकट नहीं होने देता, पर अपने सारे कष्टों के बीच से जो नई दृष्टि मैंने पाई है, उसने एक बात मेरे सामने साफ कर दी है कि जिस ‘अकेलेपन’ की बात अस्तित्ववादी लोग करते हैं, वह महज एक खोखला रूमानी ‘कन्सेप्ट’ है, जिसका भारतीय जन के अकेलेपन से कोई संबंध नहीं। मेरे और इस देश के मेरे-जैसे असंख्य अनाम लोगों के अकेलेपन के बीच जाने-अनजाने एक गहरा इंटरएक्शन है। तुमने कभी गाँव-देहात के ऐसे लोगों को देखा है जो बिना किसी गिला-शिकवा के एक पेड़ या टीले की तरफ देखते हुए गुज़ार देते हैं। मैं पिछले दिनों गाँव गया था तो एक बूढ़े नट को एक मेड़ पर बैठे देखा, जो घंटों से उन खेतों की ओर एकटक देख रहा था, जिनसे उसका कोई रिश्ता नहीं था। मेरे लिए यह दृश्य सार्त्र या काफ़्का के किसी नायक के अकेलेपन से ज्यादा डरावना था।
बहरहाल, न जाने क्या-क्या लिख गया। शायद हम लोग उम्र के उस मुकाम पर पहुँच गए हैं, जब लगता है कि गाड़ी छूट रही है, इसलिए जरा तेज दौड़ना चाहिए। पर तुम तो जानते हो, मैं कितना सुस्त हूँ। खैर, अब बन्द करता हूँ — एक ‘जायका’ पहुँच गए हैं — दिल्ली में भी कम नहीं हैं।
पत्र तुरन्त दो। सभी मित्रों से मेरा अभिवादन कहो। बच्चों को स्नेह।
परमानंद श्रीवास्तव
गोरखपुर
आदरणीय भाई,
सुन कर आश्चर्य हुआ कि आप पचहत्तर के हो गए! न पढ़ना कम हुआ, न लिखना कम हुआ, न आत्मीयताएँ कम हुईं, न कोई ऐसा-वैसा रोग, न व्याधि, न थके, न हारे, न टूटे — फिर किस बात का पचहत्तर? उम्र इस जैसों के लिए है, आप के लिए नहीं।
परमानंद जी, मुझे याद है — ‘अपना मोर्चा’ आया ही आया था; दूसरों ने उसे तो अभी पढ़ा नहीं था, या पढ़ा था तो राय नहीं कायम कर सके थे कि ‘भंगिमा’ में ‘नया उपन्यास’ घोषित करते हुए आप ने ‘रिव्यू’ की थी। इसी तरह तद्भव का अंक जब तक मेरे हाथ में आए, बाज़ार में पहुँचे, तब तक जाने कैसे आपने ‘रेहन पर रग्घू’ पढ़ लिया और फोन पर मुझे बधाई दे डाली। यह मेरे ही साथ हुआ हो, ऐसी बात नहीं। इन पचास-पचपन सालों में जाने कितनी पीढ़ियाँ आईं, जाने कितने कथाकार आए, कहानी-उपन्यास में जाने कितने बदलाव आए — ये सब के सब अगर किसी एक आलोचक के चौकन्नेपन, सतर्कता और जागरूकता के साक्षी हैं तो वह परमानंद हैं।
दूसरी बात, मेरे समय में आप के साथ ही कई आलोचक हुए, उनमें से अधिकांश की ‘सौंदर्याभिरुचि’ जड़ और रूढ़ हो गई।
समय बदलता गया, कहानियाँ बदलती गईं, लेकिन वे रूप को बदलने में असफल रहे। समय आगे बढ़ता गया, वे पीछे छूटते गए। लेकिन आप अकेले अपवाद हैं। आप जितने हमारे दौर के आलोचक के रूप में स्वीकृत रहे हैं, उतने ही आज के नये कहानीकारों में भी। बल्कि कह सकते हैं कि वे आप को हमसे कहीं ज्यादा अपना समीक्षक मानते हैं। ऐसा सौभाग्य किसी दूसरे समीक्षक को हासिल है क्या?
हमें विश्वास है, आप अपनी ऊर्जा अगले पच्चीस वर्षों तक इसी तरह हम कथाकारों में ‘जेनरेट’ करते रहेंगे।
यह पत्र इसलिए कि शायद उस अवसर पर — जब सभी अपने लोग जश्न मनाएँगे — मैं न आ पाऊँ। बहुत चाहते हुए भी। कारण, पत्नी बाहर हैं। बेटा विश्वविद्यालय जाता है। बहू नौकरी पर स्कूल जाती है। पोता बारह बजे लौटता है और मुझे उसका इंतजार करना पड़ता है। जाहिर है, 10 फरवरी ’09 को बनारस में होकर भी गोरखपुर में ही रहूँ, दिल वहीं रहेगा।
जिएँ और खूब जिएँ हम सबकी उम्र लेकर!
आदरणीय परमानंद जी,
आपसे अभी फोन में बात करके मुझे कितनी शांति मिली, मैं बता नहीं सकती। लिखने में सबसे बड़ा अवरोध अपने ऊपर संशय से पैदा होता है — मैं यह नहीं कहना चाहती कि आदमी में अपने प्रति संशय नहीं होना चाहिए, पर कुछ मात्रा में अहंग्रस्तता ही लिखने का vital force है। अशोक जी के साथ रहते हुए इस बात को मैंने बार-बार महसूस किया है। अहं से मुक्ति लिखने के लिए जितनी जरूरी है, उतनी ही अहंग्रस्तता भी। उपन्यास को लेकर शंभुनाथ जी की आलोचना का उद्देश्य रचनात्मक ही है, पर बीच-बीच से कुछ 20–21 पेज सुनकर की गई आलोचना ने मुझे एकदम धराशायी कर दिया था। आपने उस मन:स्थिति से मुझे उबार लिया। उपन्यास में बहुत कमियाँ हो सकती हैं, पर यदि वे मेरी सीमाएँ हैं, तो उनके साथ दुनिया के सामने जाने में मुझे कोई डर नहीं। हर व्यक्ति तोलस्तोय नहीं हो सकता। पर इसका अर्थ यह तो नहीं है कि वह न लिखे। उपन्यास की इस स्टेज पर उसे किसी को पढ़ाने का मकसद यही था कि उसके कुछ रोड़े हटाए जा सकें। लेखक को अपने लिखे से एक तरह का मोह हो जाता है, जिसके कारण यह देख नहीं सकता, उसे उस मोह से दूर किया जा सके। कल अशोक जी कह रहे थे कि Saul Bellow जैसे बड़े लेखकों ने कई किताबों में अपने एडीटर्स के प्रति आभार व्यक्त किया है।
आस्वादन की क्षमता और उसके साथ ही निश्छल हार्दिकता का मेल सहज नहीं है — हार्दिकता इसलिए कि उसके बिना आप किसी के लिए अपने काम छोड़कर समय और ऊर्जा क्यों खर्च करेंगे? मेरा सौभाग्य है कि मुझे अशोक जी में और आपमें दो-दो ऐसे गुरु मिले हैं, जिन्होंने मुझे अपने गुरुत्व से गढ़ा है। क्या कहूँ? कुछ भी कहने से वह भावुकता लगने लगेगी या धृष्टता। बस इतना कह सकती हूँ कि उपन्यास लिखते समय भी हर समय आप मेरे पास मौजूद रहे हैं। इसलिए पूरा होते ही मैंने सबसे पहले आपको सूचना दी। उपन्यास में कुछ ताजापन या नयापन आया, तो इसलिए कि मुझे मालूम था कि आप इन स्थलों को पढ़कर आनंदित होंगे। शायद लिखने का अर्थ (और जीने का अर्थ) इसी विश्वास में कहीं छुपा है। नहीं तो आदमी किसके लिए लिखता है?
आप मुझे ‘समवेयर इन द नार्थ’ के बारे में अपने सुझाव जरूर दें। वह शुरुआत है — क्या वह पठनीय/रोचक नहीं बना है? क्या उसमें बहुत-सी बातें भर दी गई हैं? क्या उसमें संवाद न होकर वर्णनात्मक शैली खटकती है? क्या वह औपन्यासिक नहीं बना? क्या रामविलास बाबू का प्रसंग एक प्रक्षेपण की तरह है? क्या कथा लगभग असंबद्ध? क्या किशोर बाबू की कथा में उससे बाधा पड़ती है? क्या कथा बार-बार हाथ से फिसल जाती है?
पुनश्च, छपवाने के लिए देश निर्मोही से बात हुई थी। वे चाहते थे कि नवम्बर तक भेज दूँ ताकि फरवरी में दिल्ली में बुक-फेयर में रखा जा सके। क्या यह जल्दबाजी होगी?
प्रिय ज्ञान
तुम्हारा और शकुन्तला जी का पत्र कल ही डाक से मिला। मैं परसों 3.1.63 को रात में सवा नौ बजे तो आया ही था। आया तो मकान खोलते हुए अजीब सा लगा। रिक्शे वाले की रोशनी की सहायता से लैम्प ढूँढ़ रहा था तो शीशा ही टूट गया। सामान मेरे साथ बहुत था। अटैची, बिस्तर (होल्डाल), टोकरी — जिसमें पहाड़ी मिर्चें थीं — और प्रेम के लिए खरीदा हुआ सितार। खाना लखनऊ से ही आया था : उसे ठंडा ही खाकर सो गया। और तब यात्रा की परिसमाप्ति का अवसाद मन पर छाया रहा। इतनी सर्दी में कम लोग इतना सैलानीपन बरतेंगे जैसा मैंने किया। मुझे तो यात्रा बहुत सुखकर लगती है न! अतः झेल गया। पीठ में ठंड जरूर लगी है और दर्द भी है। पर गुड्डू जो कानपुर स्टेशन पर मुझे छोड़कर जितना रो रहा था, उसका दर्द और भी ज्यादा है। चाचा जी और चाची जी दोनों की रट रहती है उसे। कितना प्यारा और कितना समझदार हो गया है वह।
सबेरे सबेरे जय करता है, सबके पैर छूता है। खूब घूमता है, खेलता है और निर्भीक है। तुम गुड्डू को अब तो शायद 3, 4 महीने बाद देखोगी तो पाओगी कि कितना बड़ा हो गया है। और बहुत अच्छे शिष्ट नागरिक संस्कार हैं उसके। चाची जी, के लिए पूछने पर कहता है कि वहाँ! यानी वहाँ हैं यहाँ नहीं।
और सबसे रोचक तथ्य तो यह है कि मैं फैजाबाद होते हुए लखनऊ गया था : लखनऊ महज 3–4 घंटे रहा और फिर रात दिन बाजपुर रहकर दो रोज के लिए लखनऊ आ गया था। क्योंकि बीच में वृहस्पतिवार था जब लखनऊ में अमीनाबाद बंद होता है। लखनऊ में ‘प्रोफेसर’ नाम की फिल्म देखने गया और बहुत बोर हुआ। हाँ एक जापानी फीचर फिल्म जरूर मैंने देखी जो बहुत अच्छी थी। फैजाबाद में सब ठीक ठाक था। अम्मा (सुनीता की माता जी) का बहुत आग्रह था — तब से टाल रहा था। यह जरूर था कि वहाँ रूक नहीं सकता था क्योंकि जल्दी बाजपुर पहुंचना चाहता था। पर अब तो गोरखपुर में हूँ। और यह न पूछो कि कैसे हूँ। पीठ में दर्द है। एक दांत में दर्द है और मन तो लग ही नहीं रहा है। मन बिल्कुल ही नहीं लग रहा है। अकेलेपन का सुख तो क्षणभर के लिए होता है — पर दुख तो अपार होता है। इसकी जैसी अनुभूति मुझे हो सकती है वैसी तुम्हें (और शकुन्तला जी को भी) हो नहीं सकती क्योंकि कोई न कोई तो संरक्षण की छाया तुम्हारे ऊपर रखता ही है। यहाँ वैसा कुछ नहीं है महज स्मृतियों की छाया है पर वह निरन्तर एक सी शीतल तो है नहीं।
तुम्हारा स्वेटर लगभग तैयार था। शायद 4 को बाजपुर से चला होगा। पार्सल किया होगा लोगों ने। भाभी तथा एक अपरिचित महिला ने बुना है उसे। बाजपुर की तमाम महिलाएँ (खासकर वे जो एक ही मकान के 5 हिस्सों में रहती हैं) तुम्हें बहुत बहुत देखना चाहती हैं।
पत्र लिखते–लिखते — आज 6/1/63 तारीख हो गयी। कल बीच ही में कॉलेज जाना पड़ा। शाम को प्रेम का सितार पहुंचाना पड़ा। मेरे एक मित्र फिर आ गए। 7 बजे तुम्हारे मामा जी के यहाँ गया। चाची जी के बुलाने पर। और 8 बजे लौटा। आज सुबह हमारे मौसा जी आए। अभी मेरी थीसिस की रिपोर्ट नहीं आयी। प्रतीक्षा है। प्रतीक्षा का तो युग ही है। सभी प्रतीक्षा कर रहे हैं किसी न किसी की। मैं रिपोर्ट की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। कल केदारनाथ सिंह मिलने आए थे तो इतनी अच्छी कविताएं सुना गए कि तबीयत खुश हो गयी। आज सुबह मैंने भी शायद 6 महीने बाद एक कविता लिखी। लगा कि रस भीतर शेष है — जड़ता थीसिस की ही थी, सो उसके साथ गयी। यह नयी कविता तुम्हें ही अर्पित करता हूँ : इससे अधिक अभिन्न और आत्मीय और क्या चीज होगी : कविता पीछे लिखी हुई है।
आने के बारे में शीघ्र लिखूँगा। यहाँ की स्थिति देखकर। प्रेम को तुम्हारी बहुत प्रतीक्षा है। कल तुम्हारी वहाँ बहुत चर्चा थी। आज वसंतपुर भी जाऊँगा और शैल के यहाँ भी। कुछ समाचार दोनों जगह का नहीं है। शेष समाचार देना और मेरे आने की प्रतीक्षा करना। तुम्हारे आने की प्रतीक्षा मुझे और मेरे घर दोनों को ही है। घर का हुलिया ही बदल गया है। सब कुछ अस्तव्यस्त। वसन्तागम से की मनोदशा पूरे।
मैं अभी-अभी 2 बजे अपराह्न शांतिनिकेतन से लौटा हूँ। कुछ ही देर पहले। प्रेम बुआ बर्दवान नहीं रुकीं। वे कलकत्ते से कल शांतिनिकेतन एक्सप्रेस से आयीं — यह ट्रेन बर्दवान होकर शांतिनिकेतन जाती है। मैं और मेरे सहयोगी लेक्चरर डॉ. मोहन यहाँ उसी ट्रेन से पूर्व योजना के अनुसार कल ही वहाँ पहुँचे। वहाँ डॉ. रामसिंह तोमर के निजी गेस्ट हाउस में ठहरे।
ऐसा अद्भुत सांस्कृतिक दल विश्वभारती, शांतिनिकेतन के प्रदर्शन पर निकला था। कल शाम वहाँ उनके बैले आदि तो देखे ही, विश्वभारती के संगीत विभाग की छात्राओं-छात्रों के नृत्य कार्यक्रम भी देख लिये। खुले मैदान में दरी पर दस हजार स्त्री-पुरुष चुपचाप बैठे। दो घंटे का यह अद्भुत कार्यक्रम देखते रहे। श्यामा नृत्यनाटिका का अंश देखकर तो तुम लोगों की खूब याद आयी। वही-वही धुनें जो मिक्की श्रुति जी भरकर गाती हैं।
यहाँ के नृत्य विभाग के आचार्य का एकल नृत्य भी देखा। दसवीं कक्षा की छात्राएँ इतने मंजे अभिनय नृत्य प्रस्तुत करती हैं कि आश्चर्य होता है और दस हजार लोग चुप रहकर साँस रोक कर विभोर यह सब देखते हैं। कल शाम पहले श्रीनिकेतन गये थे जहाँ ग्रामोद्योग की कुछ चीजें लीं — एक फाइल, एक पत्रपेटिका, एक थैला, कुर्ते के कपड़े। बहुत अच्छा सामान नहीं था, पुराना था। यह साड़ी टिपिकल शांतिनिकेतनी। युनिवर्सिटी की गाड़ी में तोमर जी ने सब घुमाकर दिखाया।
आज प्रातः 6 बजे तैयार होकर शांतिनिकेतन की प्रार्थना सभा देखने गये। वह अद्भुत कार्यक्रम है। बच्चे, लड़के, लड़कियाँ पंक्तिबद्ध आते-जाते हैं और वही प्रार्थना होती है जो तुम लोगों की जानकारी में है। उसके बाद हिन्दी भवन देखा — वह कमरा देखा जहाँ हजारीप्रसाद द्विवेदी रहते रहे हैं और वे चित्र जो विनोदबिहारी मुकर्जी ने बनाये, वे मूर्ति शिल्प जो रामकिंकर जी ने बनाये हैं और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ का अपना घर देखा — ‘उत्तरायण’ — जिसमें उनके प्रयोग के कपड़े, बर्तन, कलम, काफी का प्याला, उनकी पाण्डुलिपि के अंश, उन्हें मिले सम्मान प्रमाण-पत्र रखे हैं। बिस्तर देखा जिस पर गुरुदेव सोते थे। शालवीथि, शिरीष, वकुल, वनकुंज, श्यामा, कृष्णचूड़ा, राधाचूड़ा और अनेक ऐसे वृक्ष देखे। पूरा परिवेश गुरुदेव की कल्पना का फल है।
अब वह बात नहीं। पर स्मृति पूरे सम्मान से सिंचित है। तय हुआ, कि मेरा परिवार, यानी बच्चे, बुआ का परिवार और बच्चे शांतिनिकेतन साथ ही देखेंगे।
मंच जो बनाया था खुले में अद्भुत। जैसे मण्डप जो चौड़ाई में दूर तक गया हो। पचास लोग तो वाद्यवृंदों के साथ बैठते हैं। या गाने के लिए। जब यहाँ नृत्य होते हैं।
मम्मी को बताना कि प्रेम बुआ बड़ियों की सब्जी खाकर आयी थीं। तारीफ़ कर रही थीं। श्रुति के लिए दो पेंसिलें भी रखे हुए हूँ। सब लोग ठीक से रहना। चिंता नहीं करना। ताऊ को ताई को प्रणाम कहना। हाल बताना।
प्रिय ऋत्विक,
तुम हर समय हम लोगों के आसपास मुसकुरा रहे हो। खूब हँसते खिलखिलाते रहो। तभी सब काम ठीक-ठाक होगा। दद्दा तुम्हारी चर्चा कहानी की तरह सुनता है। तुम जैसे-जैसे हँसते हो, वह भी हँसता है। तुम्हें देखने तुमको बोलते सुनने की बहुत इच्छा है। तुम्हारी गतिविधियाँ तो बहुत प्यारी हो रही हैं। खाना बना कर तैयार रखते हो, नाना को बुलाते हो, कि ठंडा हो रहा है। मैं जल्दी ही कभी इलाहाबाद का कार्यक्रम बनने पर, पहले तुम्हारे पास आऊँगा। अभी इतना ही।
खूब-खूब प्यार के साथ।
हिन्दी साहित्य के मशहूर आलोचक, कवि, कथाकार, कॉलमिस्ट और अब व्यास पुरुष परमानन्द श्रीवास्तव का व्यक्तित्व साहित्य संसार के लिए जाना-पहचाना और बखूबी जांचा-परखा है। वह हिन्दी साहित्य और आलोचना के क्षेत्र में कुछ इतने वरिष्ठ हैं कि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के सभी पहलुओं से सब वाकिफ हैं। कुछ ऐसा नया नहीं है जिसे दुहराव से बचे बिना कहा जा सके। गोरखपुर में जिलाधिकारी के रूप में अपनी तैनाती के दौरान परमानंद जी को बेहद करीब से (जितना सम्भव हो सका) जानने का मौका मिला। उनके लेखन से उनके विशालकाय व्यक्तित्व का जो अनुमान हमने छात्र जीवन से लगा रखा था, उसके विपरीत उनका कद, उनकी सक्रियता और रचनात्मकता को आश्चर्यजनक रूप से मात देने वाला है। गोरखपुर शहर में प्रगतिशील, बौद्धिक विरासत को संभालने और उसका प्रतिनिधित्व करने में परमानंद जी सबसे आगे रहते हैं। कला, संगीत, साहित्य, विकास, शिक्षा, अनुसंधान, इतिहास, संस्कृति से जुड़े कार्यक्रमों से लेकर राजनीतिक आंदोलनों तक परमानंद जी समान रूप से सक्रिय और मूल्यवान भागीदार रहते हैं। वह गोरखपुर शहर के इतने आत्मीय हैं कि वैचारिक या राजनीतिक मतभेदों के बावजूद खुद को किसी भी आयोजन से दूर नहीं कर पाते। इस मामले में वे पंथ-निरपेक्ष माने जा सकते हैं। हिन्दी के दूसरे तमाम बड़े आलोचक या साहित्यकार जो अपनी उपस्थिति को लेकर बेहद चयनधर्मी और गैरजरूरी हद तक विशिष्ट हो चले हैं वहीं परमानंद जी बेहद सहज, सरल और सर्वसुलभ हैं। अनगिनत आयोजनों में जहाँ अपने पद की मजबूरी के चलते मुझे जाना पड़ता था, वहाँ अपने स्वभाव और संरक्षकत्व के चलते परमानंद जी भी मिल जाते थे। अखबार वाले जब किसी महत्वपूर्ण विषय पर असंभव सी अवधि में कोई सार्थक टिप्पणी अथवा लेख छापना चाहते थे तो परमानंद जी के अलावा और कोई व्यक्ति यह कार्य नहीं कर पाता था। एक और बात अहम थी। वह यह कि हिन्दी रचनाशीलता और समुदाय के लिए परमानंद जी जितने प्रिय थे, उर्दूभाषी, ईसाई और मुस्लिम समुदाय को भी वह उतने ही पसंद थे। अपने लगभग दो वर्ष लंबे कार्यकाल में मैंने देखा कि हिन्दी-उर्दू के छोटे से छोटे रचनाकार की हौसला आफजाई में परमानंद जी अत्यंत उत्साह के साथ कार्यक्रम की रूपरेखा तय करने से लेकर उसे सम्पन्न करने तक सक्रिय रहते थे। जहाँ तक मैंने महसूस किया, वह विरले इस मामले में हैं कि उन्हें बौद्धिक-अहं और साहित्यिक-दंभ छू भी नहीं गया है। परमानन्द जी हर उम्र के व्यक्ति के साथ मित्रवत या बराबरी का बरताव कर लेते हैं – बिना अपनी वरिष्ठता और बौद्धिक आभामंडल को बीच में लाए।
आज जब हिन्दी के तमाम शलाका पुरुष लिखना-पढ़ना छोड़ मौखिक परंपरा को समृद्ध कर रहे हैं या अपने गंभीर ज्ञान और गझिन अनुभव के आधार पर वर्तमान रचनाकर्म एवं जीवन की थिसारस कर रहे हैं, परमानंद जी आश्चर्य की सीमा तक समसामयिक सृजन एवं जीवन से लेखन के स्तर पर जुड़े हैं। एक विस्थापित की डायरी और अपने तमाम लेखों में वे बेहद संवेदनशील इतिहासकार की तरह अपने आस-पास की दुनियाँ में बीतने वाले पल-पल का लेखा-जोखा समेटने की कोशिश करते दिखते हैं। यह गैरजरूरी-सी लगने वाली गतिविधियाँ, घटनाएं और औसत लेखन कर्म ही किसी सृजनशील समाज की धड़कन हैं। यह दरअसल भाग रही जिन्दगी को पकड़ने की एक बेचैन कवायद भी है। यही कवायद आने वाले वर्षों में मौजूदा दौर और जिन्दगी पर गंभीर पड़ताल, साहित्य और सभ्यता के इतिहास में इस दौर के मूल्यांकन का बुनियादी दस्तावेज साबित होगी।
बौद्धिकता के लिहाज से परमानंद जी का व्यक्तित्व जितना गम्भीर है व्यवहार के स्तर पर वह उतने ही मधुर, कोमल और सहज हैं। व्यवहार में उनका संवेदनशील कवि उनके आलोचक पर भारी है। संभवतः इसका कारण जीवन-जगत को लेकर उनका रूमानी नजरिया है। परमानंद जी की सामान्य बात-चीत से लेकर लेखन तक में उनकी जिन्दगी और आलोचकीय पड़ताल के दायरे में आने वाली स्त्रियों की भरमार देखने को मिलती है। वे बेहद संजीदगी और मिठास भरे लहजे में रचनाकार, सहधर्मी, रंगकर्मी, संस्कृतिकर्मी, स्त्री-मित्रों और समकालीन युवा लेखिकाओं को न सिर्फ याद करते हैं बल्कि उनके सृजनकर्म की अहमियत का रेखांकन भी करते चलते हैं। मैंने उन्हें यह सब किसी स्वार्थ अथवा desire के तहत करते नहीं देखा। यह उनके स्वभाव का हिस्सा ही है। कई बार कुछ लोग इसी कारण उनकी आलोचना भी करते हैं। किन्तु साहित्य के पुरुषवादी सामंती पुरोधा अपने परोक्ष आचरण में यही कार्य स्त्रियों के प्रति लोभ और असम्मान की सीमा तक जाकर करते हैं।
उम्र के इस पड़ाव और उपलब्धियों के इस शिखर पर भी उनका मन एक चंचल बच्चे जैसा है जो हर नई चीज और रचना के प्रति उत्साह से भरा हुआ है। हमें याद आ रहा है कि एक बार किसी अखबार के लिए मालविका ने गोरखपुर शहर पर
एक कविता लिखी जो बाद में ‘राप्ती किनारे का एक शहर’ नाम से किसी पत्रिका में छपी और चर्चित हुई, उसमें परमानंद जी का जिक्र था। परमानंद जी ने स्वयं इस कविता का उल्लेख कई महत्वपूर्ण सार्वजनिक एवं साहित्यिक मंचों पर किया। नए लेखन और नई प्रतिभाओं को जितना प्रोत्साहन वह देते हैं मेरी जानकारी में कोई दूसरा उतना या वैसा नहीं देता। परमानंद जी जीवन भर अपनी जमीन और जीवन के बुनियादी सरोकारों से जुड़े रहे, अभी भी जुड़े हुए हैं। शायद इसीलिए गोरखपुर छोड़कर कहीं और नहीं बसे। साहित्य और आलोचना की दुनिया जिस खेमेबंदी में बंटी हुई है उसमें परमानंद जैसे आलोचकों के लिए कोई अलग जमीन घर के बाहर शायद कहीं भी न होती।
अंत में मैं परमानंद जी पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी के उपलक्ष्य में सभी को हार्दिक बधाई देता हूँ।
डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव को मैं सेंट एंड्रयूज कालेज के दिनों से जानता था। मैं उन दिनों बी. ए. का छात्र था और वे हिंदी विभाग के अध्यक्ष थे। छोटा कद, क्लीन शेव, सफेद रंग का कुर्ता-पैजामा और पाँव में चप्पल। वे दिखने में बहुत विनम्र लगते थे। उनके बारे में प्रचलित था कि हिंदी के बहुत बड़े विद्वान हैं, लेकिन उनके कद-काठी से ऐसा नहीं लगता था। वे हमें बिहारी और जायसी पढ़ाते थे। ये दोनों कवि हम लोगों के लिए अबूझ थे, लेकिन उनकी व्याख्या के बाद सरल दिखने लगे थे। इन कवियों को पढ़ाने के बाद वे प्रकारांतर से कुछ नई चीजें बताते थे, जिससे हमारे विचारों के क्षितिज खुलते थे। उनसे हम लोगों ने अज्ञेय के बारे में जाना — जो हिंदी कविता के बड़े व्यक्तित्व थे। उनके तार-सप्तक की धूम थी। वे सप्तऋषि थे। वह अकविता और नई कविता का दौर था। हम कविताओं को पढ़ जरूर लेते थे, लेकिन उनका समझना मुश्किल था। कविताओं की व्याख्या भी कविताओं की तरह अमूर्त होती थी। उन्हीं दिनों कालेज की लायब्रेरी में कल्पना, लहर, ज्ञानोदय जैसी पत्रिकाएँ आती थीं — जिसमें परमानंद की समीक्षाएँ और कविताएँ पढ़ने को मिल जाती थीं। उन्हें पढ़ के उनकी विद्वत्ता के संदेह दूर हो जाते थे।
परमानंद श्रीवास्तव के पढ़ाने की शैली अलग थी। उनकी भाषा अन्य अध्यापकों की भाषा से आधुनिक थी। जायसी को वे बहुत मनोयोग से पढ़ाते थे। वे बताते थे कि विजयदेवनारायण साही ने जायसी पर अत्यंत महत्वपूर्ण लिखा है। बिहारी की भाषा और व्यंजना उन्हें प्रिय थी। हम छात्रों को उन्हें देख कर बिहारी का वह दोहा याद आता था — “सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर / देखन में छोटे लगें, बेधें सकल शरीर।” यह दोहा उन पर सटीक बैठता था। बाद में यह दोहा उनके जीवन के साथ जुड़ गया। इस दोहे का इस्तेमाल वे अपने बचाव में करते थे। कक्षा के अनेक छात्रों को उनकी भाषा नहीं समझ में आती थी। उनकी भाषा परम्परागत नहीं थी, थोड़ी बौद्धिक जरूर थी। जिन छात्रों की रुचि साहित्य में थी, उनके लिए उनकी भाषा कठिन नहीं थी। मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। वे हमें कविताओं का अर्थ लिखने के लिए देते थे। मैंने उन्हें लिख कर दिखाया तो बोले — अब इस तरह की अलंकारिक भाषा का चलन नहीं है, बस तुम सीधी-सादी भाषा में अपनी बात कहो। यह मेरे लिए सूत्र-वाक्य की तरह था और अब तक मैं इस लीक पर चल रहा हूँ।
कुछ दिनों बाद वे सेंट एंड्रयूज छोड़ कर विश्वविद्यालय चले गए।
जब मैंने विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में दाखिला लिया तो उनसे परिचय की जरूरत नहीं थी। मेरे हिंदी विभाग के दाखिले से मुझे ही नहीं, उन्हें भी खुशी हुई। मैंने यह पूछने का साहस नहीं किया कि वे आखिर क्यों कालेज से चले आए। विश्वविद्यालय कालेज से बड़ी जगह तो थी ही। गोरखपुर का हिंदी विभाग काफी समृद्ध था। रामचंद्र तिवारी, गिरीश रस्तोगी, रामदेव शुक्ल, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कृष्णचंद्र लाल जैसे लोग थे, जिनके भीतर गहरी रचनात्मकता थी। वे साहित्य में भी जाने जाते थे। परमानंद श्रीवास्तव इन लोगों में सर्वोपरि थे। उनकी किताब — नई कविता के परिप्रेक्ष्य में, और कविता संकलन — उजली हँसी के छोर पर, प्रकाशित हो चुकी थी। बताया जाता है कि यह शीर्षक अज्ञेय की किसी कविता-पंक्ति के नाम पर रखा गया था। पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख और कविताएँ छप रही थीं। वे सेमीनारों और सम्मेलनों में बुलाए जाते थे। वहाँ से लौट कर वृत्तांत बताते थे। हिंदी के कवियों-कथाकारों से उनका परिचय था। उनके विभाग में आने के बाद साहित्यिक गतिविधियाँ बढ़ रही थीं। हिंदी विभाग में उन्होंने हिंदी साहित्य परिषद नाम की संस्था गठित की थी — जिसके छाते तले कार्यक्रम होते रहते थे। हर साल कविता, कहानी, निबंध प्रतियोगिता आयोजित की जाती थी। पुरस्कार वितरण के लिए किसी बड़े साहित्यकार को बुलाया जाता था। मुझे याद है, ऐसे अवसर पर यशपाल का आगमन हुआ था। संयोग से मैं तीनों प्रतियोगिताओं में प्रथम था। जब पहले, दूसरे और फिर तीसरे पुरस्कार के लिए मेरा नाम सामने आया तो उन्होंने मेरी पीठ ठोकते हुए कहा — तुम एक दिन अच्छे कवि बनोगे। अच्छे कवि बनने का गौरव तो मेरे पास नहीं है, लेकिन हिंदी कविता में मेरा विनम्र योगदान तो है ही। यह बात मेरे करीबी भी मानते हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि मेरी बनावट में परमानंद ऐसे कई लोगों की भूमिका है।
इन प्रतियोगिताओं के इतर कई तरह के आयोजन होते थे, इसमें हिंदी विभाग के आचार्यगण शामिल होते थे। मुझे याद है कि काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘नया मोर्चा’ पर परिसंवाद आयोजित किया गया था। यह उपन्यास बनारस के छात्र आंदोलन पर आधारित था। इसे परमानंद श्रीवास्तव ने नया उपन्यास कहा था। इस तरह के अनेक आयोजन होते थे और इन सब गतिविधियों के सूत्रधार परमानंद श्रीवास्तव थे। गिरीश रस्तोगी की नाट्य संस्था — रूपान्तर से भी वे जुड़े हुए थे। वे बहुत अच्छे वक्ता थे। वे नपा-तुला बोलते थे। उनकी आवाज तीखी और पेनीट्रेटिंग थी। उनके पास टकसाली भाषा थी। ज्ञान तो था ही। उन्हें बोलने के लिए कोई तैयारी नहीं करनी पड़ती थी।
शुरू में वे गोलघर, गांधी आश्रम के पास वाली गली में रहते थे। वहाँ उनसे मिलना सुविधाजनक था। बाद में वे सूरजकुंड के आवास विकास कालोनी में चले गए — जो शहर के दूसरे छोर पर था। शाम होते रिक्शेवाले मना कर देते थे। वहाँ सवारियों के लुटने का खतरा था। अब उस कालोनी का विस्तार हो चुका है। वह शहर की मशहूर कालोनियों में शुमार हो चुका है। जो उनके मुरीद थे, वे उतनी दूर जाने का दुख उठा लेते थे। मेरी नौकरी लग चुकी थी। कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में छप रही थीं। चूँकि मेरे तमाम रिश्तेदार गोरखपुर में थे, बहन की शादी वहीं हुई थी, इसलिए वहाँ किसी न किसी बहाने जाता था। क्या कोई उस शहर को भूल सकता है — जिसने जीवन जीना सिखाया, जहाँ अच्छे ही नहीं बुरे अनुभव भी मिले। बुरे अनुभव जिंदगी के लिए ज्यादा मूल्यवान थे, उनसे बहुत सीख मिलती है। उस वक्त तक परमानंद श्रीवास्तव कीर्तिवान हो चुके थे। वे साहित्य में गोरखपुर के पर्याय बन चुके थे। उनके लिखने का सिलसिला जोर पकड़ चुका था। प्रायः मुख्य पत्रिकाओं में उनका लिखा मिल जाता था। लेखन के मामले में वे पूर्णकालिक थे। घर के राशन-पानी और अन्य पारिवारिक गतिविधियों से उनका कोई सरोकार नहीं था। यह भूमिका पत्नी निभाती थीं। वे साहित्य के अलावा कोई बात नहीं करते थे। उन्हें सेमिनारों और गोष्ठियों से फुर्सत नहीं मिलती थी। एक कार्यक्रम से लौटे तो दूसरे की तैयारी करने लगते थे। जब मैं आता तो कविता सुनाने के लिए कहते। मैं उसके लिए तैयार हो कर नहीं आता था। एक बार की बात है, वह कुछ साहित्यिक लोगों के साथ बैठे हुए और कविता सुनाने के लिए कहा। मैंने वही पुराना वाक्य दोहरा दिया कि मेरे पास डायरी नहीं है। फिर बोले, मैं उन पत्रिकाओं को निकाल कर लाता हूँ। अब मेरे पास बचाव का कोई रास्ता नहीं था। कवि को अपनी कविताएँ याद रहनी चाहिए, लेकिन हिंदी में अनेक कवि हैं जिन्हें अपनी कविताएँ याद नहीं हैं। हम सब कवि इस कमजोरी के शिकार हैं। समाज ही ऐसा है, जिसमें कविताओं के लिए जगह नहीं बची है, इसलिए कोई उत्साह नहीं बनता। मैं जब भी जाता, वह अपनी नई कविताएँ जरूर सुनाते। मुझे उनकी कविताएँ सुन कर अच्छा लगता था।
आठवें दशक का उत्तरार्ध परमानंद श्रीवास्तव के साहित्यिक जीवन का नया समय था। उसी समय उनकी कविता की किताब — अगली शताब्दी के बारे में, और आलोचना पुस्तक — समकालीन कविता का व्याकरण, प्रकाशित हुई थी। हिंदी कविता प्रयोगवाद, नई कविता के मुहावरों से निकल कर समकालीन हो रही थी। अकविता और नई कविता के दौर के कवि अपने मुहावरे बदल कर समकालीन हो रहे थे। मेरे एक आलोचक मित्र ने मुझे एक रूपक के सहारे बताया कि अब कवि अपने सींग मुड़ा कर नए बछड़ों में शामिल हो रहे हैं। कुछ भी कहा जाय, यह कविता का ऐतिहासिक समय था। परमानंद श्रीवास्तव के यहाँ वैचारिकता का कोई आग्रह नहीं था। उनके लिखने का कैनवास व्यापक था। 1986 में मैं गोरखपुर आ चुका था। उन्होंने कहा — अब यहाँ प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना होनी चाहिए। गोया सेंट एंड्रयूज कालेज के एक कमरे में प्रलेस की स्थापना का बिगुल बजाया गया। उस सभा में गोरखपुर के कुछ लेखक और पत्रकार थे। उसके कुछ समय बाद प्रलेस के तत्वावधान में फिराक पर महत्वाकांक्षी सेमिनार का आयोजन किया गया।
परमानंद श्रीवास्तव के जीवन की सबसे बड़ी घटना आलोचना का सह-सम्पादक होना था। उन्हें एक मंच मिल चुका था। आलोचना के लिए वे लेखकों-कवियों से सामग्री मंगवाते थे, फिर नामवर सिंह के दिशा-निर्देश से उसे व्यवस्थित करते थे। इसमें कोई संदेह नहीं, उन्होंने आलोचना को नया रूप दिया। आलोचना पत्रिका से जुड़ना उनके लिए छलांग से कम नहीं था। आलोचना में गोरखपुर के लोगों को जगह नहीं मिलती थी। उनके विरोधी क्या, उनके चाहने वाले इस बात से कम व्यथित नहीं थे। उनके कुछ प्रिय लोग थे जिन्हें वे जगह देते थे। इस कारण वह नगर में अप्रिय हो गए थे। वे निरंतर लिख रहे थे। कवि कर्म और काव्य भाषा, जैनेन्द्र के उपन्यास जैसी किताबें पहले ही प्रकाशित हो चुकी थीं। इसके अलावा समकालीन कविता पर दो महत्वपूर्ण आलोचना पुस्तकें — समकालीन कविता का यथार्थ और कविता का अर्थात — प्रकाशित हो चुकी थीं। समकालीन कविता को समझने के लिए ये आवश्यक किताबें हैं। इसमें तनिक संदेह नहीं होना चाहिए कि उन्होंने हिंदी कविता पर जरूरी काम किया है। वे अकेले ऐसे आलोचक हैं जिन्होंने आठवें दशक के बाद की कविता की सम्यक विवेचना की है, नए युवा कवियों को रेखांकित किया है। युवा कवयित्रियों के प्रति उनकी उदारता जरूर अधिक थी। पं. बंगाल और झारखंड की कुछ कवयित्रियों/लेखिकाओं को उन्होंने प्रकाश में लाया है। छोटे कद के परमानंद श्रीवास्तव ने हिंदी आलोचना में बड़े काम किए हैं। आदमी अपने कद से नहीं, पद से पहचाना जाता है। यह ओहदा आसानी से नहीं हासिल होता है, उसे श्रम और प्रतिभा से अर्जित किया जाता है। किसी का मजाक उड़ाना एक खेल है। यह कौतुक अक्सर नराधम किस्म के लोग करते रहते हैं। कहा जाता है कि जहाँ बुद्धिमान लोग पाँव रखते डरते हैं, वहाँ मूर्ख सरपट दौड़ते हैं।
परमानंद श्रीवास्तव के कवि रूप की बहुत कम चर्चा हुई है। उजली हँसी के छोर पर, अगली शताब्दी के बारे में, चौथा शब्द, एक अनायक का वृत्तांत उनके कविता संग्रह हैं। गुरु-प्रवर डॉ. कृष्णचन्द्र लाल की पत्रिका सहचर में उनके संग्रह — चौथा शब्द की समीक्षा, ‘कठिन समय में शब्द’ शीर्षक से मैंने की थी — जो उन्हें बहुत पसंद आई। उन पर केंद्रित पत्रिका के अंक को जब पुस्तकाकार शक्ल में छापा गया तो यही शीर्षक लगा था। कई विधाओं में एक साथ लिखनेवाले लेखकों की यही ट्रेजिडी है कि उनका कोई न कोई पक्ष मूल्यांकन से छूट जाता है। परमानंद जी ने कुछ बेहतर कविताएँ लिखी हैं। बटोर, यह दूरी मेरे कस्बे का हृदय है, दक्षा पटेल, रामसमुझ का हलफनामा — बटोर की पंक्तियाँ देखें —
उनकी यह कविता आज कितनी प्रासंगिक है, यह कहने की जरूरत नहीं है। उन्होंने अपने जीवन में बेशुमार यात्राएँ की हैं। इन यात्राओं पर लिखी उनकी कविताएँ — साबरमती एक्सप्रेस, जूनागढ़ गिरनार, मधुपुर की चाय, पूना की एक रात्रि — को पढ़ने का अलग सुख है। ये यात्राएँ संस्मरण लिखने के योग्य हैं। मेरी प्रिय कविता दक्षा पटेल है।
कविता की समीक्षा करनेवाले आलोचक की कविता पर क्या कोई आलोचक विचार करेगा? यह सवाल तब तक बना रहेगा जब तक कोई पारखी नजर उन तक नहीं पहुँचती। उनकी कविताओं में निरंतर वैचारिक विकास देखा जा सकता है। वे अपने पुराने मुहावरे से मुक्त होते दिखाई देते हैं। उनके जाने के बाद हिंदी कविता की आलोचना में जो शून्य पैदा हुआ है, वह बढ़ता जा रहा है। 21वीं शताब्दी के लगभग तीन दशक बीतने को हैं। अभी तक इस दौर का मूल्यांकन नहीं हुआ है।
विचार आते हैं, पर लिखते समय नहीं। सुबह की जद्दोजहद में काम निपटाते हुए मन में कितनी सारी बातें घुमड़ती रहती हैं। पूरी रील चलती रहती है। आखिरी दिनों में पिता लोगों के आग्रह पर आत्मकथ्य जैसा कुछ लिख रहे थे, जिसका कुछ अंश ‘परिचय’ के प्रवेशांक में श्री प्रकाश शुक्ल जी ने छापा था और जो गाहे-बगाहे अखबारों के स्तम्भ के रूप में छपता और पाठकों में प्रशंसित होता रहा। कभी हँसी-हँसी में ही मैंने कहा था कि आपके बारे में सबकुछ तो मालूम है, अब हम इसे पूरा करेंगे। पर मन में विचारों की आवाजाही और कागज पर उसे उतारने में बहुत अंतर है। अभी भी ‘पतहर’ पत्रिका का यह आग्रह न होता तो मेरे लिए यह कार्य दुष्कर था — इसलिए कि कहाँ से शुरू करूँ। यादें, यादें और यादें!
आज ही उनके महाप्रयाण का दिन है। बहुत सुबह उठकर उनके अनगढ़, अनछपे अंतिम पन्नों को, जो बेतरतीब लेख की शक्ल में हैं, पढ़ने की कोशिश कर रही हूँ — और उन दिनों को जीने की भी, जो मेरे मन से एक पल के लिए भी नहीं हटते। इन दिनों स्मृति उनका साथ बिल्कुल नहीं दे रही थी। बहुत कुछ गड्डमड्ड — विचारों में भी, लेखन में भी। इतना सक्रिय जीवन बिताने के बाद मन में यह कचोट, “मैंने जीवन में क्या किया।” उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के अध्यक्ष को पत्र में लिखते हैं, “आप उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान में हैं तो मैं घर में हूँ।” एकांत श्रीवास्तव संपादक वागर्थ, कथाक्रम, रवीन्द्र कालिया संपादक नया ज्ञानोदय, श्री मुरली मनोहर प्रसाद सिंह संपादक नया पथ, सूर्यनाथ सिंह, राजेन्द्र राजन, रमेश दवे, बलराम आदि संपादकों के नाम अनेक लिफाफे खुले पड़े हैं। शब्दों का कोलाहल, छोटे-छोटे वाक्य जिनमें कोई तारतम्य नहीं जैसे।
साहित्य का नया अनुशासन / साहित्य का समाजशास्त्र / उपन्यास का समाजशास्त्र / डी. पी. मुखर्जी / श्यामचरण दूबे / पी. सी. जोशी / रामचन्द्र गुहा / सतीश चन्द्र / सुधीर चन्द्र इतिहासकार / गिरीश मिश्र / अंबेडकर / गांधी स्वराज पर अरविन्द केजरीवाल / अन्ना हजारे / दूसरा गांधी / आधुनिक / उत्तर आधुनिक / औपनिवेशिक / उत्तर औपनिवेशिक / साहित्य समय / सांस्कृतिक समय / अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव / अरुंधती राय / प्रभाष जोशी स्मृति शेष है। बारिश में घर डूब रहा है। राजेन्द्र यादव अपने में खोकर अपने को अनायक कहते हैं।
उन्हीं दिनों आकाशवाणी में शमशेर जन्म शताब्दी पर गोष्ठी होनी थी। भोपाल से राजेश जोशी, प्रज्ञा रावत, नई दिल्ली से मदन कश्यप और भी बहुत सारे लोग घर पर मिलने आए। अपने प्रियजनों को एक साथ देखकर बहुत खुश हुए, खासकर राजेश जोशी से मिलकर — क्योंकि इसके कुछ ही साल पहले उदयप्रकाश वाले प्रसंग में बहुत आहत होकर लिखा था, ‘मेरे प्रिय कवि राजेश जोशी ने कहा है कि उनका मुझसे मोहभंग हुआ। मैं कहीं तक गिर सकता हूँ। राजेश जोशी का दुःख मेरा भी है। राजेश ने भले खलनायक खोया हो, मैंने साथी, प्रिय कवि खोया है। राजेश की डायरी मेरी प्रिय किताब है। इस घटना ने मुझे बहुत आहत किया है।’ जबकि सच्चाई यही थी कि प्रिय कवि से मिलने के लोभ में वे कार्यक्रम तक पहुँच गए। जीवन में यह पहली और अंतिम बार ही हुआ होगा। शहर में कोई बड़ा कवि और लेखक आकर चला जाए, यह पिता को मंजूर न था। एक बार एम्स (नई दिल्ली) के मेरे प्रिय डॉ. विनोद खेतान, जिन्होंने गुलजार पर किताब भी लिखी है — ‘उम्र से लम्बी सड़कों पर गुलजार’ — को यहाँ से वैशाली भी पकड़नी थी। मैं पापा को लेकर स्टेशन गई और वहाँ हम लोगों ने आधे घंटे का बहुत ही सुन्दर समय बिताया। परिवार उनके साथ था। डॉ. साहब हमेशा कहते थे, ‘समय का अभाव था, नहीं तो मुझे ही उनसे मिलने जाना था। इतने बड़े लेखक होकर परमानन्द जी मुझसे मिलने आए।’ डॉ. साहब की कविताओं से और गद्य से भी पापा रूबरू हो चुके थे, पर मिलना पहली बार हो रहा था। दोनों एक दूसरे को विनम्रता से अभिभूत।
कवि केदारनाथ सिंह के मित्रों की दुनिया बहुत बड़ी थी — बलिया से दिल्ली तक — पर पिता के तो वही अभिन्न मित्र थे, सहोदर भ्राता की तरह, सन् 55–56 से। आखिरी दिनों में जब वे देखने आए तो पिता ने कहा, “केदार जी, बस आप ही से मिलने के लिए मैं जीवित हूँ।” कण्ठ रुँध गया उनका। केदार जी ने होठों पर उँगली रख दी और गले लगकर दोनों मित्र रो पड़े। ‘परिचय’ में प्रकाशित अपने आत्मवक्तव्य में पिता स्वीकार करते हैं कि कविता पर उनकी पहली पुस्तक ‘नयी कविता का परिप्रेक्ष्य’ नयी कविता के बहाने केदार पर अधिक केन्द्रित जान पड़ेगी। “धीरे-धीरे मैं ही आलोचक की भूमिका में उनका पहला पाठक भी था। उनकी तमाम कविताएँ मेरे सामने ही पढ़ी गई हैं।” निधन के बाद गोरखपुर आने पर केदार जी स्मृतियों में बह गए। “इस बार गोरखपुर खाली-खाली सा लगा। परमानन्द थे तो कभी ये एहसास हुआ ही नहीं। यहाँ सबसे अभिन्न वे ही थे। हरिहर जी तो रिश्ते में थे, पर दोस्त तो परमानन्द ही थे।”
पारिवारिक चिन्ताओं में भी दोनों मित्र साथ थे। पापा भी अपना सुख-दुःख उन्हीं से साझा करते थे। दिल्ली रहना बहुत होता था उन दिनों, और जब तक केदार जी जे. एन. यू. में थे या जब तक बेटियों का विवाह नहीं हुआ होगा, पापा वहीं ठहरने लगे। 84 के दंगों के दिनों में दिल्ली में ही थे और वहाँ से बहुत दुखदायी यादें लेकर लौटे।
पिता अपने आप में पूरी संस्था थे। सेन्ट एण्ड्रयूज कालेज की आरम्भिक गतिविधियों के बारे में तो वे लिख ही चुके, पर बहुत कम लोगों को पता होगा कि रूपान्तर नाट्य मंच के गठन के दिनों में वे गिरीश रस्तोगी जी के साथ थे और काफी लंबे समय तक अपना सक्रिय योगदान दिए। शंभु तरफदार और दुर्गा प्रसाद जी यह भली भाँति जानते हैं। (आज ही दुर्गा प्रसाद जी के निधन की खबर मिली।) उन्हें बाद में हम लोगों ने 1975 में समानान्तर बाल रंगमंच की स्थापना की, जिसने उनकी छत्रछाया में शानदार बीस वर्ष पूरे किए। उन्हीं दिनों सूरजकुण्ड आना हुआ तो डॉ. लाल बहादुर वर्मा के साथ मिलकर प्रगतिशील बाल विद्यालय की स्थापना की, घर-घर घूम कर बच्चों को इकट्ठा करते ताकि इस बियावान में छोटे बच्चों की पढ़ाई के लिए कहीं इधर-उधर न जाना पड़े; और इसमें उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। खूब अच्छा पाठ्यक्रम बना। NCERT की किताबें रखी गईं। नृत्य, संगीत और नाटक की नियमित कक्षाएँ लगतीं। पहले ही हम लोगों ने समानान्तर बाल रंगमंच की ओर ब्राजील का बाल नाटक “नीला घोड़ा” खेला। पर सारे उपक्रम के बाद भी विद्यालय ज्यादा दिन नहीं चल सका। फिर प्रयाग संगीत समिति से जुड़कर संगीत, गायन और कथ्थक की कक्षाएँ चलने लगीं। गुरु प्रेमशंकर जी खुद कथ्थक सिखाते थे। पं. रामाश्रय झा, राहत अली जी के कई कार्यक्रम हुए। कभी किसी के घर बैठकी, कभी खुले आसमान के नीचे मंच बनाकर। समानान्तर की गतिविधियाँ पूरे साल चलती ही रहतीं। शहर की अनेक संस्थाओं को उनका संरक्षण प्राप्त था ही, जिनके कार्यक्रम में वे भरी दुपहरी या झमझमाते पानी में भी निकल जाते — कोई साधन नहीं। न कहीं आने-जाने के लिए कभी कोई शर्त किसी से रखी। हर जगह सहज ही हाजिर। बाद में जब वे बहुत बीमार रहने लगे, तभी उसी उत्साह से हर कार्यक्रम में शरीक होना चाहते। उन्हें यही छटपटाहट तब होती कि मेरे बिना कैसे उसका काम चलेगा। मन की ऊर्जा तो अक्षुण्ण थी, शरीर ढलता जा रहा था। दूसरी बात, स्मृतियाँ साथ नहीं दे रही थीं। नाम गड़बड़ा जाते थे। विचार गड्डमड्ड। ऐसे में विषय से भटकाव हो ही जाता, जिसके कारण बाद में वे उपहास के पात्र बनते। यह स्थिति हमारे लिए बहुत त्रासद थी। कई बार ऐसा लगता, मुझे प्रतिवाद करना चाहिए था। जिस पिता को इतना सुचिन्तित, स्पष्टवादी लेखन में भी और जिन्दगी में भी देखा था, उन्हें इस स्थिति में देखना बहुत कष्टकारी था। लेखन में अस्पष्टता और बिखराव तो आ ही रहा था, यह हम जान-समझ रहे थे। चौतरफे हमले भी हो रहे थे। प्रियजनों ने अपने आलेख में इसका उल्लेख किया ही है।
मैं इस अप्रिय घटना को ज्यादा याद भी नहीं करना चाहती। हमारी स्मृतियों में तो वे पिता हैं जिन्हें सुनने के लिए लोग सीढ़ियों पर खड़े रहते थे। अपनी संस्कृत, अर्थशास्त्र या इतिहास की कक्षाओं को छोड़कर कक्षा में हमेशा पूरी तैयारी के साथ जाते। निराला और पाश्चात्य काव्य पढ़ाते ही, बीच में कबीर और जायसी भी पढ़ाया। जायसी और निराला पर साहित्य अकादमी का मोनोग्राफ भी लिखा। जिस समय जायसी पढ़ा रहे थे, सारी कक्षा निराला छोड़कर जायसी ही पढ़ने लगी, विशेष कवि वाले पर्चे में।
एक और घटना याद आती है। जिस दिन सत्यप्रकाश जी के निधन का समाचार मिला, हम अस्पताल में थे। पिता का पथरी का ऑपरेशन हुआ था। कमजोरी तो थी ही, एनेस्थीसिया का प्रभाव भी था, तो हमें लगा यह त्रासद, अप्रत्याशित खबर अभी उन्हें नहीं बताई जाए। लोग देखने आ रहे थे — मदन मोहन जी, मनोज कुमार सिंह, अशोक चौधरी, कृष्णचन्द्र चाचा जी। तो हम इशारों से ही बात कर रहे थे कि अभी यह खबर न दी जाए। पर उसी बेहोशी के आलम में बड़बड़ा रहे थे कि आज सत्यप्रकाश को भी आना था, पर उनकी तो ट्रेन ही दुर्घटनाग्रस्त हो गयी। हम सब स्तब्ध! जबकि वहाँ न कोई समाचार, न कोई टी. वी., न मोबाइल — मित्र के जाने का यह कैसा पूर्वाभास!
सबको एक साधकर चलने की कला उन्हें बखूबी आती थी। कोई विरोधी नहीं, एक शांत और सुस्थिर व्यक्तित्व। जगदीश नारायण श्रीवास्तव कहते हैं कि “परमानन्द अपने समीक्षात्मक लेखों में भी प्रगतिशील और प्रयोगवादी दोनों तरह की कविताओं में कोई वैचारिक फर्क रेखांकित न कर, कलात्मक स्तर पर न जाने कहाँ से साम्य स्थापित कर देते थे।” चित्तरंजन मिश्र के शब्दों में — परमानन्द जी अपने संगठन और सहयोगी संगठनों की ओर से रूपवादी होने का आरोप लगाए जाने का खतरा स्वीकार करके भी रचनात्मक आस्वाद की खोज और पहचान कराते हैं। इसीलिए अज्ञेय और मुक्तिबोध की रचना-दृष्टियों के भेद की चर्चा तो करते हैं, पर दोनों की रचनाओं के आस्वाद और कलात्मक महत्व को एक तरह की गहराई से विवेचित-विश्लेषित करते हैं। निर्मल वर्मा के कला-विवेक की भी प्रशंसा करते हैं और मुक्तिबोध के अनगढ़पन में जो कलात्मकता है उसे भी पहचानते हैं।
यह तो हुई लेखन की बात। व्यक्तिगत स्तर पर भी नामवर जी जितने प्रिय, सम्माननीय, रामस्वरूप चतुर्वेदी भी उतने ही करीबी थे। रघुवंश जी, विजयदेवनारायण साही, दूधनाथ सिंह, मुद्राराक्षस, भगवान सिंह, कुँवरनारायण, मंगलेश डबराल से लेकर अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों से भी उनका अच्छा संवाद था। आलोचना के संपादन के दिनों में आलोचना को ही जी रहे थे। देशभर के लेखकों से पत्र और फोन पर आग्रह करके सामग्री मंगाना, दो-तीन अंक की योजना एक साथ बनाकर लोगों से व्यक्तिगत मिलकर भी लेख इकट्ठा करना, बिल्कुल नए लोगों को आलोचना में लिखने के लिए प्रोत्साहित करना — यह सब उनकी नियमित दिनचर्या में था। डायरी में एक-एक अंक के लिए कई-कई विषय-सूची मिलती है। अंत तक उसमें संभावित फेरबदल करते। रघुवंश मणि अपने आलेख में कहते हैं कि किस तरह मेरे वक्तव्य की उन्होंने तुरन्त नोटिस ली और उसे आलोचना में देने का आग्रह किया, जबकि वह आलेख की शक्ल में उस समय था भी नहीं। बोधिसत्व भी एक बार घर आए तो कहने लगे, परमानन्द जी ने अपनी आलोचना की किताब में इतनी बार मेरा नाम लिया है जबकि मैं साहित्य में बिल्कुल नौसिखिया था। मुझे याद है कि निलय उपाध्याय भी अपनी पहली कविता की पांडुलिपि लेकर आए थे और पिता के सुझावानुसार रात भर जाग कर कविताएँ फेयर करते रहे। अगले दिन उनका काव्यपाठ रखा गया था। विजयदान देथा ने ‘अदीठ’ कहानी यहीं पढ़ी। सारा सामान, सोफा वगैरह बाहर निकालकर ड्राइंगरूम में दरी बिछती और तीस-चालीस लोग आसानी से बैठ जाते। बिज्जी यहाँ से बहुत सी सुखद यादें लेकर गए।
बीच में साहित्य अकादमी के चुनाव को लेकर कुछ मनोमालिन्य हुआ भी, तो बहुत ही मार्मिक पत्र लिखकर बिज्जी ने ही पहल की। यह पत्र ज्यों का त्यों ‘प्रतिमानों के पार’ में छपा है।
स्मृतियाँ बहुत हैं। एक आलेख में अँट नहीं सकतीं। पिता के साथ सबसे ज्यादा समय मैंने बिताया है। एक समय का, जब एक-एक किताब आलमारी में कहाँ रखी है यह मुझे जानकारी थी। लिखना होता था, पर्चा बनाना — क्षण भर में मैं किताबें जुटाकर दे देती। इस मामले में पिता बहुत व्यवस्थित न थे। कई बार हमने कोशिश की कैटलागिंग करने की, पर वो चल नहीं पाता। बीच में जब उन्हें कुछ महीने बर्दवान रहना पड़ा तो भी उन्हें अपना वही किताबों से भरा हुआ तखत और कोने वाली कुर्सी याद आती। कहते, पढ़ना तो हो जाता है पर लिखना तो गोरखपुर में ही संभव है। जिस दिन लेख शुरू करना होता, सुबह पाँच बजे ही बैठ जाते। रात में उसकी पूर्व तैयारी कर चुके होते। किताबें जमा ली जातीं। नींद में ही भूमिका तैयार हो जाती। जब तक लेख अपनी रवानी न पकड़ लेता, नाश्ते के लिए भी नहीं उठते। दोपहर होते-होते लेख तैयार। एक झोला उनका खूँटी पर हमेशा टंगा रहता, जिसमें फोन, बिजली के बिल, बैंक के जरूरी कागजात के साथ ही ढेरों चिट्ठियाँ रहतीं। यह क्रम अनवरत चलता रहा। जिन दिनों बर्दवान थे, उस समय भी ज्यादातर पत्र यहीं आते थे — विश्वविद्यालयों की मौखिक परीक्षाओं के, सेमिनार के, देश भर में होने वाली गोष्ठियों के। उन दिनों फोन तो सहज उपलब्ध था नहीं। बड़ी मुश्किल से कभी एस. टी. डी. से बात हो पाती। ताऊ जी मेरे टेलीफोन एक्सचेंज में थे तो वही माध्यम थे। पर बाहर रहकर भी मन उनका घर-परिवार में ही खिंचा रहता, इसीलिए गोरखपुर छोड़ने की बात कभी सोची ही नहीं। हालाँकि शुरू से ही प्रलोभन कई थे। पर सारे झंझावातों से जूझते, देशभर में आवाजाही करते, बीमारियों से लड़ते गोरखपुर में बने रहे। दिल्ली अपनी सांस्कृतिक, साहित्यिक गतिविधियों के कारण खींचती थी। आखिरी बार तबियत ज्यादा बिगड़ने से पुस्तक मेले में शामिल होने की इच्छा मन में ही रह गई। डायरी में कई जगह लिखा है — दिल्ली ने मुझे छोड़ दिया।
“मैं दिल्ली की डोर से बँधा हुआ हूँ। यह खिंचाव सिर्फ पुस्तकों के कारण नहीं है। दिल्ली सारी कलाओं का घर है। चित्रकार मंजीत बावा, स्वामीनाथन से लेकर रतन थियम, बी. वी. कारन्त, देवेन्द्र राज अंकुर तक यह दुनिया काफी बड़ी है। कलाओं का अन्तर्गुंफन बहुधा कविताओं में देखा जा सकता है।”
कभी मुक्तिबोध पर लिखने के लिए उन्होंने ही विषय सुझाया था — ‘भयानक समय के निहितार्थ : मुक्तिबोध की कविताओं में’। आज जब यह भयावहता चारों तरफ, सारी दुनिया में पसरी है तो लगता है कि इसका अंदेशा उन्हें पहले से था। यह अकारण तो नहीं होगा कि सन्नाटा, अँधेरा, विस्थापन, मृत्यु जैसे शब्द बार-बार आते हैं। किताबों के शीर्षक भी कुछ इसी तरह के हैं — ‘अँधेरे कुएँ से आवाज’, ‘सन्नाटे में बारिश’, ‘अँधेरे समय में शब्द’, ‘एक अनायक का वृत्तांत’। ‘अँधेरे कुएँ से आवाज’ में एक लेख है, ‘किताब से कौन डरता है’ —
“जब नई दिल्ली के सोलहवें पुस्तक मेले में पहुँच कर पहली ही खबर दहला देने वाली होती है कि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की पूर्व अनुमति के बगैर किताब का लोकार्पण या पुस्तक विमर्श प्रतिबंधित है, और तो और कहा जा रहा था कि किताबें कंटेंट के आधार पर ही अनुमति पा सकेंगी। किताबों के लोकार्पण पर रोक सिर्फ लोकार्पण पर रोक नहीं है — विचारों की दुनिया पर रोक है, एक पूरी आजादी पर रोक है।” वहीं एक गुस्सा भी कवि के मन में है कि ‘यह देश किताबों के लोकार्पण पर प्रतिबंध को खबर नहीं मानता, जबकि कभी प्याज की बढ़ती कीमत, सड़क, पानी, बिजली की समस्या पर इस हद तक नाराज हो सकता है कि साम्राज्य रातों-रात उखड़ जाए।’
परमानंद जी पिछले कई वर्षों से बीमार चल रहे थे। जाना सबको होता है, वे भी गए। सब प्रार्थनाएँ, शुभकामनायें और सदिच्छाएँ धरी रह गईं और वे चले गए। कभी किसी प्रसंग मे परमानंद जी ने दाग एक शेर पढ़ा था जो बड़े त्रासद ढंग से उनके ऊपर भी मौजू लगने लगा था –
परमानंद जी भले ही अब गए हों, उनकी शख्सियत तो पहले ही चली गई थी। खराब स्वास्थ्य और स्मृति में गड्ड मड्ड हो जाने के कारण वे सन्दर्भ से परे हो चले थे। यद्यपि उनकी आवाज की बुलंदी अभी भी बची हुई थी। उनकी उपस्थिति महज विनोद की वस्तु होकर रह गई थी। इस हाल में भी लोग बाग उनका मज़ाक उड़ाने से बाज नहीं आ रहे थे। उन्हें प्यार करने वाले लोगों के लिए बेहद यातनादायी अनुभव क्षण थे। इसे नियति का क्रूर व्यंग्य ही कहेंगे कि जीवन भर आदर, स्पृहा और बहुधा ईर्ष्या के आलंबन रहे परमानंद जी हास्य और विनोद के आलंबन होकर रह गए थे।
. . . .लेकिन इन सबसे फरक एक और परमानंद जी हमारे भीतर मौजूद हैं और मौजूद रहेंगे – ‘हम न मरे मरिहे संसारा’ के तर्ज़ पर।
परमानन्द जी की स्मृति पहले गई, वे बाद में। उनकी स्मृति खास तरह से गई थी। वे लगातार एक अलग मनोलोक में रह रहे थे। यह साहित्यिक चिंताओं और सरोकारों का मनोलोक था। बीमारी के दौरान जितनी बार उनसे मिला –कभी भी उन्होंने बीमारी की बात नहीं की। यह कष्ट है या वह कष्ट है। उन्होंने अपने लिए साहित्य की एक समानान्तर दुनिया रच ली थी। वे उसी में विचरण करते रहे। पिछली मुलाक़ात में उन्होने बताया कि ‘विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उन्हें चाय पर बुलाया था। साथ में कुँवर नारायण और केदारनाथ सिंह भी थे। परमानंद जी ने विश्वनाथ प्रताप सिंह से कहा –प्रेमचंद पीठ का क्या होगा। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कहा - हाँ !गोरखपुर में नहीं बनेगा तो और कहाँ बनेगा प्रेमचंद पीठ। परमानंद जी की इस कहानी में गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्रेमचंद पीठ स्थापित करने के लिए किए गए प्रयत्नों और संघर्ष की कसक थी। १९८० में जब प्रेमचंद की जन्म शताब्दी मनाई जा रही थी तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह थे। उन्होंने गोरखपुर में प्रेमचंद का स्मारक और प्रेमचंद पीठ बनाने की बात कही थी। उसी वक्तव्य की डोर पकडे परमानंद जी ने गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्रेमचंद पीठ स्थापित करने के लिए तत्कालीन हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो शांता सिंह के साथ बेहद श्रम किया था। वे प्रेमचंद पीठ के पहले निदेशक हुए, दुर्भाग्य से आखिरी भी। जिन दिनों वे प्रेमचंद पीठ के निदेशक थे –गोरखपुर विश्वविद्यालय को साहित्य की गतिविधियों का केंद्र बना दिया। गोरखपुर विश्वविद्यालय में शुरू से अंत तक प्रेमचंद पीठ को बर्दाश्त नहीं किया गया। परमानद जी के बाद विश्व विद्यालय ने प्रेमचंद पीठ को इस तरह भुला दिया जैसे वह कभी थी ही नहीं। गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्रेमचंद पीठ को हमेशा व्यक्तिगत स्वार्थ के दायरे में ही देखा गया। परमानन्द श्रीवास्तव के प्रति व्यक्तिगत ईर्ष्या से भरी कुछ आत्माएं प्रेमचंद पीठ को परमानन्द श्रीवास्तव की प्रोफेसरी से जोड़ कर देखती रहीं। प्रेमचंद पीठ के रचना काल से लोग –बाग़ यह कहते सुनते रहे –‘अरे कुछ नहीं !यह तो परमानन्द श्रीवास्तव को प्रोफ़ेसर बनाने का उपक्रम मात्र है’ . जैसे उन्हें प्रोफ़ेसर बनाया जाना कोई जुर्म हो। जातिवाद, चाटुकारिता और जोड़ तोड़ के बलबूते विश्वविद्यालय में घुस आये लोग कुछ ज्यादा ही हल्ला मचा रहे थे। उन्हें यह इल्म ही नहीं था कि हिंदी और उर्दू के इस महान लेखक की स्मृति से जुड़े साहित्य सृजन केंद्र का होना किसी विश्वविद्यालय या संस्थान के लिए कितने गौरव की बात होती। पर विश्व विद्यालय के सामंती माहौल में इस गौरव बोध का वहां करने की क्षमता ही नहीं थी। इसी ईर्ष्या और आलोचना के बीच परमानंद जी ९५ में रिटायर हो गए। और प्रेमचंद की स्मृति का एक महत्वपूर्ण सृजन साहित्य केंद्र बनने के पहले ही विस्मृति के गर्भ में समा गया। दरअसल विश्व विद्यालयों में गैर रचनात्मक, गैर अकादमिक, अवसरवादी और चाटुकार लोगों के लगातार वर्चस्वशाली होते चले जाने से विश्वविद्यालयों की गरिमा मिटटी में मिल रही है। गोरखपुर विश्वविद्यालय से प्रेमचंद पीठ का विलोपन इसका जीता जागता उदाहारण है। विश्वनाथ प्रताप सिंह वाली इस कहानी में विश्व विद्यालयों से अकादमिक और रचनात्मक गरिमा की विदाई का दर्द भी बोल रहा था।
परमानन्द जी को जितना मैंने जाना वे साहित्य समाज के मुकम्मल नागरिक थे। अपने जीवन के बेहद सक्रिय वर्षों में वे केवल साहित्य चर्चा करते रहते थे। अमूमन हिन्दी साहित्य का अध्यापक निंदा रस में डूबा रहता है। मैंने कभी परमानंद जी को किसी की निंदा करते नहीं पाया। जब मिलो परमानंद जी किसी नए लेखक, नई किताब, नयी गोष्ठी की चर्चा में मशगूल रहते थे। गोरखपुर के वातावरण में सामंती सोच आज भी हावी है, विश्वविद्यालय टाउन होने के बावजूद सामंती चेतना का बाल बांका नहीं हुआ है। गोरखनाथ, कबीर, प्रेमचंद, फिराक के शहर को सामंती जड़ता में डूबा देखना किसी को गवारा कैसे हो सकता है। परमानंद जी ने अनजाने ही इस सामंती जड़ता से लड़ने का अद्भुत तरीका विकसित किया था। ‘बड़की मारि कबीर के चित्त ते दिया उतारि’। सामंती समाज और सामंती सोच से बेपरवाह वे साहित्य की दुनिया में रच बस गए थे। ऐसे कई लेखक मिलेंगे जो घर –दुवार, जगह-ज़मीन, नौकरी-चाकरी सब सहेजने के बाद साहित्य की ओर उन्मुख होंगे। परमानंद जी साहित्य में आए तो सब कुछ छोडकर आए। उनहोंने न तो कभी भौतिक संपत्ति की चर्चा की और न ही चिंता।
साहित्य में नए लेखकों पर जितना परमानंद जी ने लिखा उतना शायद ही किसी और हिन्दी आलोचक ने लिखा होगा। देखें तो नयी महिला रचनाकारों की बहुसंख्या को हिन्दी जगत से परिचित कराने में भी वे सबसे आगे खड़े मिलेंगे। अभी कुछ दिन पहले अलका सरावगी ने बताया कि ‘कलकत्ता विश्वविद्यालय में एम् फिल करते हुए उनको पहली बार सुनना सचमुच अद्भुत था। न केवल रघुबीर सहाय पर काम करने में उन्होंने मदद की बल्कि कलिकथा वाया बाइपास को जैसे तैसे छपने की हिम्मत भी दी’. नए लेखकों को परमानन्द जी किस कदर प्रोत्साहित करते थे इसका अंदाज़ा कलिकथा वाया बाईपास के बारे में परमानन्द जी को लिखे अलका सरावगी के पत्र से मिलता है –
“उपन्यास लिखते समय भी हर समय आप मेरे पास मौजूद रहे हैं। इसलिए पूरा होते ही मैंने सबसे पहले आप को सूचना दी। उपन्यास में कुछ ताजापन या नयापन आया तो इसलिए की मुझे मालूम था की आप इन स्थलों को देख कर आनंदित होंगे। शायद लिखने का अर्थ (और जीने का अर्थ ) इसी विश्वास में कहीं छुपा है। नहीं तो आदमी किसके लिए लिखता है?
आप मुझे ‘समवेयर इन नार्थ’ के बारे में कुछ सुझाव जरूर दें। वह शुरुआत है –क्या वह पठनीय /रोचक नहीं बना है? क्या उसमें बहुत सी बातें भर दी गई हैं? क्या उसमें संवाद न होकर वर्णनात्मक शैली खटकती है? क्या वह औपन्यासिक नहीं बना? क्या रामविलास बाबू का प्रसंग प्रक्षेपण की तरह है? लगभग असम्बद्ध? क्या किशोर बाबू की कथा में उससे बाधा पड़ती है? क्या कथा बार-बार हाथ से फिसल जाती है?”
लेखक अपने आलोचक से उपन्यास की घटनाओं और पात्रों के बारे में इस तरह चर्चा आखिर कैसे करता है। यह भरोसा आलोचक की संलग्नता से आता है। इसी तरह माई और मेरा शहर उस बरस की लेखिका गीतांजलिश्री के पत्र से पता चलता है की परमानन्द जी रचना को कैसी आत्मीयता देते हैं –“पर मुझे आपका रिब्यू लेख अच्छा लगा। अच्छा लगा कि इतनी गंभीरता से आपने दोनों किताबें पढ़ीं, उनके सन्दर्भ बिठाए, मेरी कोशिश को पहचाना और बढ़ावा दिया” . आखिर आलोचक की भूमिका क्या होती है –लेखक की कोशिश को पहचानना और उसे बढ़ावा देना। परमानन्द जी अपनी आलोचना से यही करते रहे हैं। ऐसे लेखको की लम्बी सूची बनेगी जिनकी कोशिशों को परमानन्द जी ने पहचाना।
पिछले डेढ़ दशकों से गोरखपुर में सांप्रदायिकता का विष फैलाया जा रहा है। परमानंद जी ने उसका पुरज़ोर विरोध किया। मुझे याद है लगभग उन्हीं दिनो आलोचना का फासीवाद विरोधी अंक निकला था। परमानन्द जी व्यक्तिगत बातचीत से लेकर साहित्यिक समारोहों /सार्वजनिक मंचों तक फासीवाद के विरुद्ध धुंआधार बोल रहे थे। नए लेखकों और नए विचारों के प्रति उनका नजरिया सदैव सकारात्मक था। नए से नए लेखक पर लिखने बोलने से उन्होंने कभी गुरेज नहीं किया। इसी तरह नयी संस्थाओं को बल देने में वे सदैव तत्पर रहे। नए लेखक पर लिखना आलोचकीय साहस की मांग करता है। परमानंद श्रीवास्तव में यह आलोचकीय साहस अपनी पीढ़ी के आलोचकों मे सबसे ज्यादा था। समकालीन हिंदी आलोचना में परमानन्द जी नए लेखकों और महिला रचनाकारों के पक्षकार के रूप में उपस्थित थे। यह भी उनकी सामंतविरोधी चेतना का एक पक्ष है। वे निरंतर सामंती जड़ता के विरुद्ध संघर्षरत रहे।
परमानंद जी से मेरी पहली भेंट 1980 में हुई थी। तब मैं बी ए का छात्र था। पडरौना के उदित नारायण कॉलेज में, जहां थोड़े दिन पहले तक केदारनाथ सिंह प्राचार्य थे। वहाँ समकालीन कविता पर संगोष्ठी थी। जाड़े का दिन था। बाहर से आए विद्वानों के समूह में छोटे क़द के परमानंद जी छुप से जा रहे थे। मोटा और लम्बा ऊनी कुर्ता, शेरवानी, पाजामा और शाल ओढ़े परमानंद जी बैठे थे। केवल उनकी चमकती हुई आँखें ही उनकी शख्सियत का पता दे रही थीं। जब वे बोलने के लिए खड़े हुए तो उनकी खनकती हुई आवाज ने हम सबका ध्यान खींचा। लगा जैसे उनका पूरा शरीर ही वाकयंत्र है। वे पूरे शरीर से बोलते थे, बल्कि उनका वजूद उनकी आवाज में ही उतर आया था। इस आवाज का जादू तब समझ में आया जब 1981-1984 में विधिवत उनका छात्र होने का अवसर मिला। मैं उदित नारायण स्नातकोत्तर महाविद्यालय से B.A. करने के बाद गोरखपुर विश्वविद्यालय आया था। पढ़ने नहीं, छात्र राजनीति के इरादे से। छात्र राजनीति के लिए छात्र होना आवश्यक था। हिन्दी में थोड़ी बहुत रुचि थी और गति भी। इसलिए एम.ए हिन्दी में प्रवेश ले लिया। परमानन्द जी पहले पहल मुक्तिबोध की कवितायें पढ़ाते हुए मिले। वे भूल गलती कविता पढ़ा रहे थे। पहली ही कक्षा में हमारी चेतना में कहीं कुछ टूट रहा था, कुछ बदल रहा था। इस कविता का मेरे उपर ऐसा असर पड़ा कि प्रचलित छात्र राजनीति से मोह भंग हो गया। बाद में यह मोह भंग मुझे वामपंथी विचारों की ओर ले गया। एक निहायत पिछड़ी और सामंती पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति की चेतना को बदलने मे परमानंद जी की कक्षाओं की भूमिका अब ज्यादा समझ में आ रही है। मेरे जैसे कितने लोग होंगे जिन्हें परमानंद जी की जादुई आवाज ने बदला होगा। परमानंद जी का पूरा व्यक्तित्व ही उनकी आवाज में महदूद था। जब वे बोलने खड़े होते थे उनका रूपान्तरण हो जाता था। ऐसा तभी संभव होता है जब अपने बोले पर अखंड विश्वास हो। परमानंद जी साहित्य में सब कुछ छोड़ कर आए थे। साहित्य की दुनिया से वापसी के सारे पुल जलाकर आए थे -निहत्थे। शब्दों के सामर्थ्य पर उन्हें पूरा भरोसा था। उनकी आवाज इस भरोसे की आवाज थी, सामंतविरोधी विचारों की आवाज थी। हर तरह की कुंदता को खत्म करके चेतन बना देने वाली। इस आवाज ने कितनों को बदला, कितनों को बनाया हिसाब लगाना मुश्किल है। परमानंद जी की साहित्य यात्रा के सहयात्री केदारनाथ सिंह ठीक ही कहते हैं –‘परमानंद जी ने गोरखपुर के साहित्यिक वातावरण को आधुनिक बनाया’।
परमानन्द जी आधुनिक साहित्य के अलावा कबीर और जायसी भी पढ़ाते थे। अच्छे अध्यापक के रूप में उनकी ख्याति थी। अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद परमानन्द जी अध्यापन की जिम्मेदरियों का सम्यक निर्वाह करते थे। कई बार ऐसा भी होता कि वे ट्रेन से उतरकर घर जाने की बजाय सीधे कक्षाओं में पढ़ाने आ जाते थे। उनके अध्यापन को उनकी वक्तृता और खनकती हुई आवाज विशेष बना देती।
परमानन्द जी की भाषा में एक खास तरह का चमत्कार था जो छात्रों को बरबस आकृष्ट कर लेता था। परमानन्द जी की चमचमाती हुई भाषा सहसा आकृष्ट करने वाली थी। परमानन्द जी संगोष्ठियों, सेमिनारों में बहुत आते जाते थे। लौटने पर वे बेहद चार्ज रहते और संगोष्ठियों का विवरण बड़े कौशल से कक्षाओं में सुनाते रहते थे जो कई मायनों में बहुत दिलचस्प लगता था। वे गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के बन्द बन्द से माहौल में बाहर की ओर खुलने वाली खिड़की की तरह थे। हिन्दी की दुनिया में कहाँ क्या घट रहा है इसकी जानकारी उन्हीं के माध्यम से होती थी। विभाग के दायरे और पाठयक्रम की किताबों से बाहर के हिन्दी साहित्य समाज से हमारा परिचय परमानन्द जी ने ही कराया। उस समय यह अपने आप में बड़ा अजब लगता था कि हम जिन लोगों की कहानियाँ, आलोचना, लेख आदि पाठयक्रम में पढ़ा करते हैं, वे सब परमानन्द जी के मिलने जुलने वाले हैं। अनेक कवि लेखकों से हमारा साक्षात्कार परमानन्द जी के माध्यम से ही हो पाया।
गोरखपुर में रहते हुए उन्हें कई मोर्चों पर लड़ना पड़ा। एक पुरातन सामंती सोच वाले शहर में नए साहित्य के लिए बिलकुल जगह नहीं थी। जहां विश्वविद्यालय जैसी संस्था भी जड़ता का शिकार हो वहाँ और जगहों की कल्पना भी कैसे की जा सकती थी। हिन्दी विभाग में रहते हुए परमानन्द जी ने नए साहित्य के लिए जगह बनाई। गोरखपुर विश्वविद्यालय में जब तक रहे साहित्य की मुख्यधारा और साहित्य के वर्तमान से उसे जोड़े रखा। उनके लिए आलोचना स्मृति और वर्तमान से निरंतर संवाद थी। यह संवाद उन्होने शैक्षणिक जीवन में भी बनाए रखा। कबीर, जायसी, निराला, प्रेमचंद और मुक्तिबोध से होते हुए केदारनाथ सिंह, रघुवीर सहाय, कुँवर नारायण तक और साहित्य में आने वाली युवा और युवतर पीढ़ी तक उनकी नज़र थी। नया से नया और बड़ा से बड़ा लेखक परमानंद जी के माध्यम से अपने को गोरखपुर से जुड़ा महसूस करता था।
गोरखपुर प्रेमचंद की कर्मभूमि रही है, इसे गोरखपुर के साहित्यिक वातावरण मे जीवंत करने मे अकेले परमानंद जी ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। उन्होंने विश्वविद्यालय मे प्रेमचंद पीठ स्थापित करने का मुहिम छेड़ा और उसे अंजाम तक पहुचाया। प्रेमचंद की स्मृति उनके लिए सामंती चेतना के विरोध का सशक्त माध्यम थी। इसीलिए परमानंद जी प्रेमचंद से जुड़ी हर गतिविधि के सहयात्री बन जाते थे। गोरखपुर में इप्टा की नाट्य प्रस्तुतियां हो या अन्य कोई आयोजन। प्रेमचंद और फिराक की स्मृति को जीवंत करने में वे युवा उत्साह से जुटे रहते। प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना को लेकर वे बेहद उत्साहित थे। वे संस्थान को साहित्य का वैकल्पिक केंद्र बनाने में शिद्दत से जुटे थे। प्रेमचंद साहित्य संस्थान से त्रिलोचन, श्रीलाल शुक्ल, भीष्म साहनी, राजेंद्र यादव, नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, मार्कन्डेय, दूधनाथ सिंह जैसे नामचीन साहित्यकारों को जोड़ना परमानंद जी के बूते की ही बात थी। प्रेमचंद साहित्य संस्थान की प्रगति और विकास के लिए वे लगातार चिंतित और सक्रिय रहे। प्रेमचंद साहित्य संस्थान के अध्यक्ष के रूप में उन्होने सदैव हमारा मार्ग दर्शन किया।
मैंने आखिरी दिनों में परमानंद जी से आत्मकथा लिखने का प्रस्ताव किया था। लेकिन देर हो चुकी थी। सिलसिलेवार आत्मकथा लिख पाने की हालत में वे नहीं रह गए थे। आखिरी मुलाक़ात में उन्होंने मुझे 20-25 पृष्ठों की हस्तलिखित सामग्री दी है। सुंदर और सधी हुई लिखावट में। यह आत्मकथा तो खैर किसी तरह नहीं है। अनेक रचनाकारों, रचनाओं, विचार यात्राओं का ढीला ढाला कोलाज जैसा है, परमानन्द जी ने जिसका शीर्षक दिया है –साहित्य से निर्वासन। और पहला वाक्य है ‘साहित्य में रहने के लिए निर्वासन जरूरी है’। अपने आखिरी दिनों में परमानंद जी एक तरह से निर्वासन झेल रहे थे। जैसे निर्वासन ही साहित्य में बने रहने का उपाय हो। बक़ौल फैज -
परमानन्द जी के जीवन के ७८ वर्ष साहित्यिक सक्रियता के वर्ष रहे हैं। सेण्ट एण्ड्रूज कालेज, गोरखपुर विश्वविद्यालय से लेकर वर्धमान विश्वविद्यालय तक विस्तृत अध्यापन के साथ उनकी लगभग डेढ़ दर्जन किताबें, आलोचना जैसी पत्रिका का सम्पादन, साहित्य अकादेमी, हिन्दी परामर्श मण्डल की लगभग एक दशक तक की सदस्यता, प्रेमचन्द पीठ गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रथम प्रोफेसर, प्रेमचन्द साहित्य संस्थान के अध्यक्ष के रूप में परमानन्द श्रीवास्तव की सक्रियता लगातार बनी रही। हिन्दी की अपरिचित से लेकर सुपरिचित तक शायद ही कोई पत्रिका हो जिसमें परमानन्द जी का लेख, समीक्षा या टिप्पणी न छपी हो। आलोचक के रूप में परमानन्द श्रीवास्तव का संवाद साहित्य की नयी से नयी पीढ़ी के साथ निरन्तर बना रहा है। उनके इस साहितियक अवदान के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का भारत भारती सम्मान तथा बिड़ला फाउण्डेशन का व्यास सम्मान भी मिला।
परमानन्द जी की आकांक्षाओं महत्वाकांक्षाओं की दुनिया अकादमिक और साहित्यिक गतिविधियों तक सीमित थी। इससे इतर उनकी कोई कानिस्टचुएन्सी थी ही नहीं। गोरखपुर की सांस्कृतिक निर्मिति इसके बिल्कुल विपरीत थी। वर्ग और जाति के आग्रह यहाँ के सांस्कृतिक परिदृश्य पर इस कदर हावी थे और हैं कि पचास वर्षो में विश्वविद्यालय का कोई बौद्धिक चरित्र ही नहीं बन सका। गोरखपुर विश्वविद्यालय और शहर का सांस्कृतिक परिदृश्य वर्ण और जाति के आग्रहों से ही परिचालित होता है। जबकि परमानन्द जी साहित्य और अकादमिक दुनिया में वर्ण और जाति के तमाम संकीर्ण आग्रहों को पीछे छोड़ कर आये थे।
परमानन्द जी की लंबाई उनके साहित्यिक और अकादमिक कद से काफी कम थी। मैंने परमानन्द श्रीवास्तव के साहित्यिक अकादमिक कद से चिढ़ने वाले अनेक सहृदय(?) और सुधी साहित्यिकों और बुद्धिजीवियों को उनकी लंबाई को लेकर मजाक उड़ाते हुए देखा-सुना है। गोरखपुर के अबौद्धिक वातावरण में ऐसी और भी अनेक चीजें हैं।
किसी के कार्य का महत्व उसके वर्ण और जाति के दायरे में ही देखने का अभ्यास है। दुर्भाग्य से परमानन्द जी गोरखपुर के वर्ण और जाति के समीकरण में कहीं अंटते नहीं थे। लिहाजा उनके व्यकितत्व को उपहास में उड़ाने का एक अघोषित सा अभियान चल पड़ा था। गांधी ने कहीं कहा है कि वे पहले उपेक्षा करेंगे, फिर उपहास करेंगे फिर तुम्हारे अनुयायी हो जायेंगे। गोरखपुर के परिदृश्य में परमानन्द जी की उपेक्षा हो नहीं सकती थी। इसलिए उपहास वाला अभियान चलता रहा। इस अभियान में धुर ब्राह्मणवादी से लेकर धुर मार्क्सवादी तक सब शामिल रहे हैं। परमानन्द श्रीवास्तव का सारा जीवन इस उपहास अभियान से लड़ते हुए बीता है। उनका प्रगतिशील लेखक संघ और नामवर सिंह से जुड़ाव हो, आलोचना पत्रिका की सम्पादकी हो या फिर व्यास और भारत भारती जैसे सम्मान, सब इसी लड़ाई का हिस्सा हैं।
वे शायद जालिम जमाने को यह दिखा देना चाहते हैं कि मेरे मजाक उड़ाने वालों मेरी काबिलियत का यह प्रमाण देखो। अब भी नहीं भरोसा है तो लो अब यह एक नया प्रमाण देख लो। केवल पुरस्कार नहीं लगातार अपनी रचनात्मकता से उन्होंने हर तरह के आलोचकों का जवाब दिया।
यह एक बड़ा ही नृशंस और अमानवीय संघर्ष था। एक पूरा शहर अपनी वर्णाग्रही मानसिकता के साथ एक कवि लेखक आलोचक का निरन्तर उपहास करता अस्वीकार करता है। हैरत होती है कि उपेक्षा और उपहास के लाक्षागृह में निरंतर जलता हुआ यह रचनाकार अपने को किस तरह बनाता है और बचाने की कोशिश करता है। परमानन्द श्रीवास्तव के अंतिम काव्य संग्रह का नाम है-एक अनायक का वृतांत। संग्रह में एक अनायक का वृतांत नाम से कविता भी है। यह कविता उनका आत्म वृतांत ही है। ऐसे दौर में जब नायक और खलनायक का भेद मिट गया हो –उन्होंने अपने लिए अनायक होना ही चुना। उनका जीवन इसी अनायक का संघर्ष है।
परमानन्द श्रीवास्तव की जीवन यात्रा हमें यह भी बताती कि एक बन्द - बन्द से सांस्कृतिक परिवेश वाले शहर में समाज कितना अमानवीय और कितना नृशंस हो जाता है। महज अपने शब्दों के सहारे उस अमानवीयता और नृशंसता से संघर्ष करता हुआ एक लेखक कितना दयनीय और कितना दुर्धर्ष हो सकता है। परमानन्द जी का जीवन संघर्षरत लेखक की दयनीयता और दुर्धर्षता का ही नहीं, अमानवीयता और नृशंसता के खिलाफ संघर्ष का आख्यान भी है।
इस आख्यान के बगैर गोरखपुर कैसा लगेगा? कितना खाली, और कैसा खाली।. . . . इस खालीपन का हिसाब कौन करेगा। आधुनिक साहित्यिक चेतना का प्रेरक और प्रसारक, एक निर्माता अध्यापक, साहित्य का संगठन कर्ता, साहित्य की दुनिया का नागरिक अपनी किताबों, पत्र पत्रिकाओं, लेखों कविताओं और खनकती हुई दमदार आवाज को छोडकर चला गया। गालिब याद आते हैं –