जीवन
डॉ. परमानंद श्रीवास्तव हिन्दी आलोचना की उस पीढ़ी के लेखक थे जिसने समकालीन कविता को पढ़ने का सलीका गढ़ा। गोरखपुर ज़िले के बाँसगाँव में जन्मे, उन्होंने तत्कालीन आगरा विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम. ए. किया और अध्यापन को जीवनयापन का साधन बनाया।
पहले गोरखपुर के सेंट एंड्रयूज कॉलेज में, फिर गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में आचार्य। वे वहाँ प्रेमचंद पीठ के पहले निदेशक भी रहे। ‘आलोचना’ पत्रिका के सम्पादन में नामवर सिंह के सहयोगी रहे, और ‘साखी’ तथा प्रेमचंद साहित्य संस्थान से आजीवन जुड़े रहे।
कविता से लेखन का आरम्भ करने के बाद उन्होंने कहानी और डायरी में भी कलम चलायी, पर सर्वाधिक ख्याति आलोचना के क्षेत्र में मिली। उनकी आलोचना ने अपने समय की सर्जनात्मकता को खोजकर रेखांकित किया और कविता की परम्परा का पुनर्मूल्यांकन भी किया।
आलोचक के साथ-साथ वे कवि भी थे — यह बात उनके पाठकों को अक्सर बाद में पता चलती।
कृतियाँ
आरम्भ कविता से, समारोप समीक्षा और आलोचना से।
तस्वीरें
परिजन, मित्र और सहयात्री
परमानंद श्रीवास्तव : अवदान और महत्व
19 एवं 20 सितम्बर 2026
स्थल : राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर
आयोजन : प्रेमचन्द साहित्य संस्थान एवं ‘साखी’ पत्रिका के संयुक्त तत्वावधान में
डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव (1935–2013) हिन्दी साहित्य के जाने-माने आलोचक, कवि और गद्य लेखक रहे हैं। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले के बाँसगाँव में जन्मे परमानन्द श्रीवास्तव ने तत्कालीन आगरा विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम. ए. की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने अध्यापन कार्य को अपने जीवनयापन का साधन बनाया और गोरखपुर के सेण्ट एण्ड्रूज कालेज से अध्यापन प्रारम्भ किया। बाद में उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में आचार्य पद को सुशोभित किया। वे वहाँ प्रेमचन्द पीठ के पहले निदेशक भी रहे।
लेखक के रूप में डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव ने हिन्दी साहित्य के कई क्षेत्रों को अपना योगदान दिया। कविता से लेखन का प्रारम्भ करने के बाद उन्होंने कहानी, डायरी इत्यादि विधाओं में भी कलम चलायी; मगर सर्वाधिक ख्याति उन्हें हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में मिली। कविता के क्षेत्र में उजली हँसी के छोर पर, अगली शताब्दी के बारे में, एक अनायक का वृत्तांत जैसी कृतियाँ उनकी काव्य-सर्जना का उदाहरण हैं। उन्होंने रुका हुआ समय और इस बार सपने में तथा अन्य कहानियाँ प्रभृति कहानी-संग्रह भी हिन्दी साहित्य को दिये। आलोचना जगत में उनकी प्रमुख कृतियाँ नयी कविता का परिप्रेक्ष्य, हिन्दी कहानी की रचना प्रक्रिया, कवि कर्म और काव्यभाषा, कविता का अर्थात, कविता का उत्तरजीवन, समकालीन कविता का यथार्थ और उपन्यास का पुनर्जन्म विशेष रूप से चर्चित रहीं।
इसके अतिरिक्त वे ‘आलोचना’ पत्रिका का सम्पादन भी करते रहे। ‘साखी’ पत्रिका और प्रेमचन्द साहित्य संस्थान से वे लगातार जुड़े रहे। अपने साहित्य-योगदान के लिए उन्हें बहुत से सम्मान और पुरस्कार भी प्राप्त हुए, जिनमें व्यास सम्मान, भारत भारती सम्मान और रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार प्रमुख हैं।
डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव की आलोचना ने न केवल अपने समय की सर्जनात्मकता को खोज कर रेखांकित किया, अपितु कविता की परम्परा को भी पुनर्मूल्यांकित किया। समकालीन कविता की यथार्थोन्मुखता को रेखांकित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने हिन्दी जगत को यह समझाने का प्रयास किया कि रचना अपने समय में तो अर्थपूर्ण होती ही है, अपने समय के बाद भी उसे नये-नये अर्थों में पढ़ा जाता है।
हिन्दी आलोचना में उनके अवसान के बाद एक गहरी रिक्ति पैदा हुई है — विशेषकर नयी रचनाओं और रचनाकारों को पहचानने और मूल्यांकित करने के परिप्रेक्ष्य में। इसी परिप्रेक्ष्य में प्रेमचन्द साहित्य संस्थान एवं ‘साखी’ पत्रिका के संयुक्त तत्वावधान में ‘परमानन्द श्रीवास्तव का जीवन, कृतित्व और महत्व’ को लेकर दो दिन के कार्यक्रम की योजना बनायी जा रही है।
डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव की स्मृति और आलोचनात्मक परम्परा को अक्षुण्ण रखने के उद्देश्य से परमानन्द श्रीवास्तव स्मृति न्यास द्वारा प्रतिवर्ष यह सम्मान प्रदान करने का निर्णय लिया गया है। सम्मान स्वरूप ₹11,000 की धनराशि, स्मृति चिन्ह और प्रशस्ति-पत्र भेंट किया जाएगा। सम्मान समारोह आयोजित करने की ज़िम्मेदारी साखी फ़ाउंडेशन की होगी।
सदस्य : डॉ. अनामिका — कवयित्री एवं लेखिका, नयी दिल्ली
सदस्य : प्रो. सदानन्द शाही — कवि एवं आलोचक, वाराणसी
चयनित आलोचक को यह सम्मान संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में प्रदान किया जाएगा।
संस्मरण
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